हा हज ऋषजए अर जा | " 2220 शनि 22, 22000

22:0734(८.०८८८०४५४

... शी उलट, 5, 22 कक / वा]

!॥ !] १5५ 8 6! रई |" 0] ॥7५0 कप: ||

| रा ६5 ॥॥॥ (कब 2 कह ही 004 88 /॥ |! | हु 020) ३2 |

;

4१७ 2 $0 (४

पं है। ॥॥/ (

| हक (72 कक रे ] 0 (५ 2

200 ही॥ हा 22] ३१६ _शिक॥ ही 0000 0900 १७

88008 7, | छु॥एत शिक्षा युजआा॥॥ ०९ भीताफ,

६८४09 ७)

९... (20 2७

[७७

पुद्टर दक्षिण पृ

सुदूर दक्षिण पृ

गीोबिमन्द्दास

आदशे प्रकादइ्मम, जबलपुर धगति प्रकाशन, मयी दिल्‍ली

च्दायी शाहुझ प्रणुल व्यस्क्र पा ९६७९१

इकाहक कीच क्ांलॉकिवों उ>शश/लाउऊ जाँपा 747. दुर्गासाह स्थुलिशिपल »र्दत री! चैनीताल हरि ह।

ईध55 ४०, -००-०-* कि 2००६ 2४०. ----** 2.9... ,००००००००५ ( कि कक

हहटक्ाएट्वं 00 ०५०२ कक मर

अूच्य को)

जल के ८3] (०

आबर्दा से पक 8 गोपाल बाम जन्नुऊपुरे हारा भकाशित हंव. सुक्रणालय अलऊपुरः हारा सुद्धित

अध्याय ख़््याय अध्याय भष्याय अध्याय जंध्यॉय अंध्यथ शिषयाथ भध्याय जैष्याय अध्याय अध्याय केश्या[य अध्याय अध्याथ अध्याय अध्याय अध्यध अध्याय सध्याय भध्याय अध्याय अध्याक

न्न्यु किक न्ध्फ

|

है. 5. ही

११ १२ रे 34

१६

१९ ब््क २१ श्र श्पैे

अनुक्रमणिका

अध्याय २४ अध्याण २५ अध्याथ २६ अध्याय २७ आअध्याज १८ अध्याय २५ अध्याय ३० भअष्याय अध्यापक ३२ अध्याय +शे अध्याय शे४॑ अध्याय है५ सिहावलोफन पशिशिष्ड १२ प्ररिक्षिष्ठ

६६०९२

छ३तप८

६९...९ ७४ १०५०११० १११-१६४ १९५-११८ ११९०१४४ १३५७०११३८ ११९०१४० १४९०-०१ ४४ १४५-०१४९ १५००३ ४३ १५४-६६४ ६६५००१६७ १६८०६७६

परिषद में माय लेते वाले सदस्य

है

किक स््ट

पालिया

यु ख्च्छ

कफ. ननलण --«०-

थों का सामूहिक खिंत्र

निधि:

अत

(4

सोसियेश

०५

हद

पालियानें

हल

कामनवेल्य॑

फुम सन १९३ए०हे८ में में पूर्व और दक्षिण आफ़िका से छौटा था और उस यात्रा पर सेने हमारा प्रधान उपभिवेश शरामक एक पुस्तक लिखी थी उस सभप भेंमे उस पुस्तक में लिखा था-- “किसी भी केश का पुरा शञाव सप्ाचाए-पन्नों या वहाँ से संबर्ध रखने घाली पुस्तकों के वराध्ययन से महीं हो सकता, इसका अनुभव मुझे आफिका-म्राश्रा से हो गया ।! पक्षिण पुर्व में व्यूजीलेंड, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर और फीजी जाकर मेरा उपपदत बिघाए और अधिक बृद् हो गया। भारत इतना बड़ा देश है, हमारी समस्याएं इतनी जदिल और महान है, हमारे थेश में अन्य देशों की यात्रा की इतनी फम्त प्रथा है और गरीबी के कारण सात्रा के इतते कम साथन है कि हुए इस संशर के भिन्‍्म-भिम्त भागों में कया है इसे बहुत कभ आनले हैं जो संपतत है और जो विदेशों को जाते भी है उसकी ये याजाएँ योरोप तथा अग्ेरिशा तक ही परिश्ित रहती हैं। अतः अधिक से अधिक यौरोप और अमेरिका को छोड़ पंसारक्षे अन्य भागोंसि हुयारा कोई संपर्क नहीं है और यवि है भी तो नहीं के बरावर भूगोल में जिनको अनुराग है ये संसार के भिम्त/भित्त भागें और विभागों को तपशे पर अवद्य पहुचान लेते हैं। इतिहास और संस्कृति से जिरहें प्रेम है बे ऐतिहासिक और सॉस्कृतिक दृष्ठि से जिम स्थानों का महत्व है बहां का ज्ञान रखते हैं। परस्तु किसी भी जगहु की सच्ची जानकारी जो वहां जाने से हो सकती है बहु इस प्रकार को पहुचान और ज्ञान से राधा भिन्‍म है। शान १९२३ में केवल २७ थर्ष की अवस्था में में स्वर्गीय पंडित सोतीलाल जी मेहक के भेतुत्व में सर्वध्रभस केद्लीय धारा सभा का सदस्य हुआ तब से अब तक इस २८ वर्षों में मे फेक्रीय असेम्दली, कौसिल आफ स्टेट, विधान परिषद और पांभेंट किसी ने किसी का सबस्य रहा। हां, उन वर्षों को छोड़वार जब कांग्रेस घाले जेल में रहे। इस काल में मेरा स्थान भी जेल ही था। घारा सभा के अपने इस लग्बे अवधि-काल में में वेदेशिक विभाग, भ्रिश्ेषकर उस स्थानों से जहां भारतीय बसे हैं, सेवा विंलचस्पी रखता रहा। केसीय

सुदूर दक्षिण पूर्व

धारा सभा की वेबेशिक विभाग की समभिति का भी वर्षों से मे सदस्य हुं और इस समिति के कांग्रेसी सदस्यों का कमबीनर' परन्तु इतने लम्बे समय से इस विभाग के अनुशभ के पश्चात्‌ भी में इसे मुक्त कंठ से स्वीकार करने के लिये तैयार हूं कि जब तक में आफ्रिका नहीं गया था तब तक वहाँ का और जब तक में सुदूर दक्षिण पूर्व के इन देशों को ने गया था तब तक इतका जो ज्ञाम सुझे था यहु नहीं के बराबर था। आफ़रिका से लौटकर जो पुस्तक मेने वहां के संबन्ध भें लिखी थी उसे उस समय लोगों ने बड़े चाय से पढ़ने की कृपा फी थी। जब म्यूजीलेंड जाने बाले भारतीय प्रतिनिधि मंडल के तामों को घोषण। हुई भौर पहु घोषित्त किया गया कि हुस प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व का भार मुझे सौंपा गया है तब ऐसे कुछ भि्रों मे जिन्होंने मेरी आफरिका यात्रा पर लिखी हुई पुस्तक को पढ़ा था, मुझसे ग्यूजीलेंड पर भी कुछ लिखे के लिये कहा। मेरा स्वयं भी अपनी इस समूली पाजा पर कुछ कुछ लिखने का विचार हुआ | आफिका पर जो पुस्तक मेने लिखी थी बहु वहाँ से छोटते हुए जहाज में। गधग अच्चाने के लिये सेरी यह यात्रा हवाई जहाज से हुई भारत लौटकर अन्य कामों में फिर से मरी तरह फेस जाने की आशंका थी इसलिये इस यात्रा में ही सेने इस पुस्तक का अधिकांश भाग समाप्त कर लिया

शँकि यहु पुस्तक उन देशों से संबंध्ध रखती है जहाँ का हुमें मोरोप और अमेरिका से भी कहीं फम ज्ञात है इसलिये सुझे घिश्नास है कि इसे पढ़ने में पाठकों का फुछ से फुछ चाव अबदय होगा

हथूजोलेड भारतीय प्रतिनिधिमंडल गया था कामनवेर्य पॉलिम्ैन्टरी एसोसियेशन में भाग लेने के लिये; अतः सर्वप्रथम काममवैत्य पालिमेन्टरी एसोसियेशन

तथा उससे संबर्ध रखने वाली कुछ बातों का विगृरशन करा देगा उपयुक्त होगा - सन्‌ १९११ में सत्ताद पंचम जाए के राज्याशिषेक के सपय एक संस्था का निर्माण हुआ जिसका नास एप्पायर पालंमेंटरी एसोसियेशन रखा गया विशाल ब्रिठिद सामज़ाज्य के सभी वेशों में पारस्परिक स्तेह बढ़ाने भौर विचारों के आवान-प्रवान के लिये हसे स्थायी संध्या की स्थापना की गयी थी। इस संस्था का पर्वेप्रथण उद्देश्य था जिट्िश साम्राज्य के अन्तर्गत सभी देशों की पालेग्रेंट सभाओं में घतनिष्ण संपर्क

स्थापित करता

पिछले ३५ वर्ष में इस संस्था की आशातीत उत्लति हुई-उसके कार्य क्षेत्र का प्रसार हुआ और ब्रिठिदा सास्राज्य के प्रायः सभी देशों में एस्पायर पारलमेंदरो एसोसिएशन को शाखाएं स्थापित हुईं। इसी अवधि में राजनैतिक उपलब्धुधल के कारण ब्रिटिश साखाज्य के देशों में अनेक परिवर्तन हुए और कई देक्षों में स्व-शासन की स्थापना हुई फलस्वरूप एस्पायर पार्लमेंटरी एसोसियेशन के विधान में परिवर्तन करने की आवश्य कता हुई इस एसोसियेशन के सदस्य देशों के पारस्परिक संबत्धों में तथा ब्रिटिश सरकार से इन सभी देशों के संबन्धों में आमूछ परिवतेन हो जानें के फारण एसोसि- पेशत के विधान की कई बलें अब अनुपयुवत सिद्ध हो गयीं |

बुत वेघानिक परिवतेनों के लिये फरवरी सम्‌ १९४८ को एसोसियेशन की कनेडा! शाला ने एक प्रस्ताव पास क्रिया अक्टूबर १९४८ में लत्दत में काम्रमवेल्थ' पालसेंटरी फॉफेस्स ले इन वैधानिक परियतेनों को स्वीकार किया इसी सभयव इस एसोसियेशन का ताभ पुस्पायर पार्लमेंटरी एसोसियेशंल की जगहु कामसवेश्य पालेमेंटरी एसोसिसेशन हुआ। यहुं भी सर्वस्ृम्भति से स्वीकार किया गया कि एसोसियेशन का कार्य छुवाद हूप से चलाने के लिये एक जनरक कॉसिक, उसके वफ्तर और भायद्यक सिधि

[३

सुपर वक्षिण पूथे

का प्रबन्ध किया जागे सभी शाखाओं को स्वीकृति प्राप्स होगे पर मई सब्र १९५० में जमरल कौंसिल की बैठक ओोटाथा में हुई इस रामय एसोसियेशम के मे चिधामस का मससोदा बनाया गया। संवभ्यर सनू १७४५० मे जमरल कौंशिस नें यह सा विधाल स्वीक्षार क्रिया हरा परिश्नान की भख्य बातों का उस्लेस परिक्षिष्ट में किया गया हैँ

एस संस्था में वे ही देश सम्मिलित हो सकते है जो स्वतंत्र हों और साथही काशनमवेलथ के सदस्य स्वतंत्र होने के पश्चात्‌ हसारे वेश के स्वाधीन प्रजातंत्र घोषित होने तक हमारी स्थिति उपनिवेश की स्थिति रही अतः सम्‌ १९४८ में लत्यन में जब इस काममवेटथ पार्लमेंटरी एसोशियेशन की परिषण हुई तब उसमें भाग लेने के लिय भारत मे गँ़दास्‍थों का एक प्रतिनिधि मंडल भेजा। इसके मेता हमारी केखीय धारा सभा के अध्यक्ष आनतलीय शी भावलंकरणजी थे। दो वर्षों के पश्चात्‌ सत्‌ १९५० में फिर से जम न्यूजीलेंड में - एसोसियेशनम की परिषद बुलायी गयी तब भारत से पाँल प्रतिनिधियों के प्रतितिधि मंशछ भेजने का मिश्थध फियानशी०ण आर० के सिंधवा, श्री० सी० स्ी० शाह, श्री बेंफट रमन, शरी० देवकात्त बचआ और में सुझे हरा संडल को भेतुर्त का कास सौंपा गया

कासमप्रेज्थ पालगेंटरी एसोसियेशल संसार की कवाचित्‌ एकशान ऐसी संस्था हु जिधकी परियदों में कोई प्रस्ताव पास नहीं होते, और कोई मतदान घहीं होता इस परिषव फी सारी कार्यवाही गोपनीय (फ्रेम में) होती थी, पतन्न प्रशिभिधियों के छिये खुली नहीं | फेवल इस वर्ष इसकी कुछ बेठकों में पत्र प्रतिनिधियों को मुधाया गया। इस परिषव सें जिन बातों पर विचार होता है वे जत्यस्त महत्वपूर्ण हैं। इस वर्ष की स्यूजीसड परिषद थें मिण्शलिखित घ्ांतों पर घिधार किया गया :- सोधबार २७ मवम्बर, १९००.....आविक व्यवस्था- अर्थ और धागिज्य धंबर्पी बने मंगलवार २८ मनम्थर, १९५०...पार्लमेंटरी सरकारें बुधवार २९ नवम्बर, १९५०... पम्ुरक्षा और प्रशांत महारागर देशीप बातें गुबबार ३० सव्ाबर, १९५०.....आंबादी का तबादला (778/90700) शुक्रपार दिसम्बर, १९५०....वैशेशिक मीति

स्यूजीलेंड की इस परिषद की तारीखें घोषित होने के पहचात्‌ एसोसियेशन की भार-

तीग्र शाखा की पैठक जयी दिल्ली में हुई और इस बैठक ने तथ किया कि भारतीय पार्सभेंट के अध्यक्ष भी सावलंशर भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नामों का मिर्णय करें।

४]

सुदूर बक्षिण पूर्च

श्री मावलंकर जी ने मंशल के नेता का चुनाव कहाँ तक उपयुक्त किया इंस पर तो सुझे कुछ पहने का अधिकार नहीं है, परन्तु जहां तश मंडल के सदस्यों का संबन्ध हूँ मेरे मता- नुसार यह चुनाव सर्वया उपग्रक्त सिद्ध हुआ। मंडल के सदस्यों में श्षी शाह की गष्भीरता, श्री वेकटरगन को कार्यतत्वरता, श्री बढआ को सिलतसारी और थी सिधवा की बाण।- जता सभी दलाघनीय रहीं। परिषद में हमारे संडल के सदस्यों ने जो भाग लिया उससे तो उसकी योग्यता सिद्ध हुई हो, परच्तु परियद्र में भाग लेवे के सिवा जो संबन्ध इस भंदल के सदस्यों ने अब्य देशों के प्रतिनिधि संडलों के सदस्यों से स्थावित किया उससे भारत वेश और भारतीय संस्कृति का सभी पर गहुरा अभाव पड़ा है इस परिषदों में परिषद की कार्यवाही के अतिरिक्त आपसी संबन्धों को बहुत अधिक महृत्थ है कदाखित परिषद की कार्यवाही से भी कहीं अधिक और इस दिशा में भारतीय प्रतिनिधि भसंडल से जाशातीत सफलता प्राप्त की है

भारतीय प्रतितिधिमंडल के अतिरिवत जिन देशों के प्रतिनिधिमंडल हत परिषद में भाग लेने के लिये आये उत्त वेशों के साम मे है

(१) यूबाइटेषड किगरइभ (१२) गोल्ड कोह४ (२) फ्मेडा (१४) किश्शि गापता (३) आस्ट्रेलिया (१४) भारीक्षत्त

(४) पूनिमस आफ सादे आफिका (१५) उत्तर रोडेश्िया (५) पाकिस्तान (१६) सिगावुर

(६) भीलीम (१७) ब्िदित होस्डशस (७) वक्षिण रोजेक्षिया (१८) विन्कवर्ड हीप (८) जमेका (१९) नाईजीरिया (५) बरभूछा (१०) फेडरशाम आफ सढापा (१०) बारंबाडीस (२११) ध्यूजीछेंड (११) बहाभा

प्रतितिधिमंडलों के सदस्यों के मास तथा संहवा इस पुश्तक के एक परिक्षिक्ष भ॑ दी गसी हैं

रद

६2 लेक में होने वाली इस फामनवेल्य पार्लमेंटरी परिषद के लिये भारतीय प्रतिनिधि मंडल फी रवानगी २८ अक्टूबर को निश्चित हुईं थी। हमारे मंडल के तीन प्रतिनिधि थी शाह, भी वेकटरमन और क्री बचा व्यूजीलेंड बस्बई से जहाज हारा जाने वाले थे और श्री सिधवा तथा में दिल्‍ली से हवाई जहाज से परन्तु श्री सिधवा बीमार हो गये और मुझे क्रिस अध्यक्ष भी राजधि पुरषोत्तम वास जी दंडत ने कांग्रेस की कार्य समिति का संबस्य घोषित कर दिया काँग्रेस की कार्य समिति की प्रथम बेठक नहीं बिल्ली सें ता० लवस्थर को मिश्चित्‌ हुई। भी सिधवा ने अपनी बीमारी के कारण और से कांग्रेस वर कार्य सिति के कारण अपने जाने की तारीलें आगे बढ़ाने के लिये भारतीय संसद फे मंत्री शी कौछ को लिखा चूँकि न्यूजीलेंड की परिषद तारीख २४ नवध्यर को होने बाली थी अतः श्री सिधवा की और भेरी रवागगी की तारीणें आगे बढ़ाने में भी कौछ को कोई कठिताई ले पड़ी।

हमारे प्रतिनिधिभंडल की रवाजगी के पूर्व हमारे प्रधान संत्री थी जवाहुरणाल नेहरू पूरे प्रतिनिधिमंडल से सिलना चाहते थे। यह भेंट तारीख २४ अकहूबर को निश्चित हुईं। भी सिधया को छोड़ हम सब तारीख २४ को बिल्ली पहुँचे त० २४ को नेहुरू जी से कोई एफ घंटे हमारी बातें हुई उन्होंने बड़ी दिूचस्पी और सहूदयता से हुससे इस

जज

प्रतिनिषिर्भडल के संबन्ध में बातें कीं

जहाज से जाने वाले सदस्य ता० २८ अक्टूबर को बम्जई से रवाना हुए कांग्रेस का्ये समिति की बेठक के पश्चात्‌, में ता० ११ नवम्बर को कलकते से हवाई जहाज ते और शी सिधवा ता० १९ नवध्दर को हवाई जहाज से

प्रतिनिधिमंडल के नेतृत्व का भार मुक्षपर रहने के क्रारण बम्मई से हमारे तीनों प्रलिनिधियों को बिद! करते के लिये जाता मेंने अपना कर्तेव्य समझा

जहाँ तक मेरी बिदाई का संबन्ध है, बग्बई, जबलपुर, दिल्ली और कलकता में सभी जगह भिन्न भिन्‍न संस्थाओं तथा मित्रों थे मुझे जिस प्रेस और उत्साह से बिदा किया यहु

६]

धुदर दक्षिण पूर्व

जीवन भर भेरे विस्थृत करने की बात नहीं है कांग्रेस कार्य समिति में मेरे आने तथा प्यूजीलेंड के इस प्रतिनिधिमंडल के नेता नियुक्त होने से जबलपुर के लोगों में तो जिस उत्लाहु की लहर दोड़ी थी चहु जबलपुर के इतिहास में एक उल्लेखनीय घदना है। सन्‌ ३० में जब में पहिली जेल यात्रा के बाद छुठा था उस समय तथा सम ३२ के सत्याग्रह के समय जो सभा मेने जबलपुर में चार दित और चार रात तक चलाई थी उसके बाद इस दो अवसरों के सिवा जबलपुर में मेंगे ऐसा उत्साह कभी नहीं देखा था सेरे काँग्रेस कार्य समिति के सदस्य और उसी के साथ इस प्रतिनिधि संडल् के नेता होने का सम्मान जबलूपुर तिवासियों ने मेरा सम्भान ते भावकर अपना सम्मान साना। रूगाताएश चार दिनों तक बिदाई के इस समारोहों की बाढूसी आगयी थी हर १५ मिलिए पर एक समारोह कैसा प्रेम का प्रवाहु था, कैसे उत्साहु की छहूर ! कैसी आत्मीयता का प्रदर्शन !

हम सब में सेरी इतनी लम्बी यात्रा के कारण करण रस का भी कस भिश्वण ले था। भेरे कुदम्वियों, खासकर मेरी माताजी और पत्नी के मन सें तो घित्ता की भी अत्यधिक मात्रा थी। कुंदुस्विपों से बिदा छेति समय सुझे पिताजी का कितना स्मरण आया। जब में आफ्रिका गया उस समय पिताजी थे। सन्‌ १५१४ में मे कौटु- स्थिक संपत्ति से त्यागपत्र दे चुका था और राज! गोकुलदास महल में रहुकर एक किंधये के मकान में रहता था। मेरे संपत्ति से त्याग पत्र देगे पर गांधीजी ने मुझे अपने एक पत्र में लिखा था कि अब तुम्हारा ओर पिता जी का प्रेम और बढ़ेगा। गांधीजी की यह भविष्य-वाणी सर्वेधा सत्य सिद्ध हुई थी पिताजी के और मेरे सिद्धांतों में आकाक्ष-पाताल का अन्तर रहुने के कारण उत्तका और मेरा सन्‌ १९२१ से ही जो संघर्ष चला करता था उसको इस संपत्ति के त्यात्न से समाष्ति हो गयी थी और सन्‌ १९३४ के पदचात्‌ उनका और भेरा स्नेह संबन्‍्च कहीं अधिक बढ़ गया था। आफ्रिका जाते हुए सम्‌ १९३७ में उन्‍होंने भी मुझे बड़ी कारणिक भावनाओं से जिंदा किया था, पर भेरे हुदय में उनके कारण एक प्रकार का पैसे था। आज में वृद्ध माताजी को उनकी दाण अवस्या में छोड़कर उसके इकछोते पुत्र होते हुए भी ८००० भील पहूर जा रह था

कजकते मुझे पहुँचाने के लिये सेरे बड़े पुत्र ससमोहनदास और उनके सित्र संस्तकुभार तिबारी आये थे वे अपने साथ साता जी का एक पत्र लाये थे। जब मेंने वह पत्र पढ़ी भावुक होने के कारण मेरी आँखों से आँसू बहू निकले। इस पत्र को भुझे लिखें गये पथरी में में अत्यन्त महत्व का पत्र मानता हूँ। पत्र नीचे उद्धृत किया जाता है

है

सुद्र दक्षिण पुर्व

राजा गोकुलवास महुझ जबलपुर <- १०५०

सिश्जीय भैया,

तुम बहुत दूर जा रहे हो एक बार और भी दूर गये थे आफिका उसके पहले तुम कभी इतनी दुर ते गधे थे जब आफिका गये थे तब जज्ञन से गये थे छत बल्त भी घेरा मन बहुत उधल पुृथल हुआ था। इत गार हवाई जहाज से जाए रहे हो, मेश मंद और भो पथल-पुथल हो रहा है। कितने लोग जहाज से समृद्र की मुस्ताफिरी करते हैं, फितमे छोग हुथाई जहाज से जाया आया फरते हैं। में नहीं जानती कि इन यात्राओं में जब पुभों के संग मां महीं रहती तब मां के मन कसे होते होंगे। पर सेरा मन जैसा हो रहा है उसका जान मां ही कर सकती है, और शोई नहीं तुम्हारी इस मुसाफिरी सें तुर्हारे साथ फोई नहीं रहेगा, तुम्र बिलकुल अकेले जाओगे, इससे मेरी चित्ता और बढ़ गयी है सूझे वह जमाना याद आता है जब बिना बीस पत्चीस संगी साथियों, मौकर घाकरों के तुम्हे फहे बाहर महीं जाने दिया जाता था

हुम जब से जस्में थे तब से लेकर जब तक तुप्त ही मेरा सहारा रहे ही। तुमने जब फांग्रेण का काम शुरः किया था तब चाहे तुम्हारे कश्का साहुब (पिताजी) उसके खिलाफ हों पर में नहीं। मेने यहू जझूर नहीं सोचा था कि उस कास का नतीजा जेल जाना और जेत के अपणिनती दुष्ध उठाना हो सकता है जब तुम पहले पहुल जेल गये तब में फिसनी घबराई थी यहू सुझे अभी भी याव हैं ओर तुम्हारे घेर से छूटने पर भुझे कितनी खुशी हुई थी वह भी से नहीं भूली हूं जिस दिन जुम छूटे थे, घर के फाठक पर जसोवा जी के समान मैंने तुम्हारी आरती फी थी। तुम्हें बिदा करते हुए में स्टेशन पर तुम्हारी मारती कर तुम्हें आसीरवाव देना चाहती थी पर तुम्हारे कक्‍्को साहुमब के जाने के बाद भेरा सरीोश इसके लायक नहीं रहा आज चि० ममपोहन तुम्हे पहुँचाने #छकता जा रहे हैं। एन्‍्हीं के साथ तुम्हे यह आसीस भेज रही हैं

जैया, तुम्हारा कुदुम्च सदा भगवान का घिस्वासी और भक्त रहा है। पुण्दे बड़े करते है। में रामायण की यहू चोपाई सदा रहतों रहुतो थी--

/ पुत्रवती युवती जग सोईं--रघुवर भवत जापु सुत्ते होई /। तुमने सुझे समक्ष दिया है कि भगवान की सेवा और जगत को सेवा एक हो योज हैँ बड़ा तक कि भगवान खुद जगत की सेवा के लिये भवतार ऊेते हैं

4 |

युदृर दक्षिण पूर्व

पुश्हारे कारन में अपनी कूख को सफल मानती हूं मेरा घन तुम्हारी इस लण्णी मसाफिरी के कारत उधल पुधल जझूर हो रहा है पर भगषान पर भेरा भदलछ विस्वाश्त हैं। तुमने हमेसा ही जोखमें उठायी हैं। उन जोलमों में भगषान तुम्हारे सहाय हे है इस यात्रा में भी वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे भा की आसीस है कि तुम्हारे कामों में कोई विघ्च गे पड़े तुम सकछ होकर राजी खुसी लोटो। में तुम्हारे लौटने तक जीती रहूँ और जब तुम छौटफर आओ तज घर के बरवाजे पर फिर में तुम्हारी आरतो उतार सकूँ यह भगवान से मेरी विनय है बुश्दारी, भा

[६

लकत्ते से मेरा हवाई जहाज ता० ११ को प्रातःकाल ४॥ बजे रवाना हीने वाला और न्यूजीलेंड के आकलेंड मगर में ता० १४ को प्रातःकाल पहुँचने बाला था। हवाई जहाज की इस लम्बी उड़ान का कार्यक्रम नीचे लिले अनुसार भा

११ सवमस्धर कलकत्ता से रवासगी ४॥ बजे सुबह सलिगापुर पहुँच बजे दोपहर १६ नवस्वर सिगापुर रवानगी बजे सुबह जकारटा पहुँच <८॥ बजे सुबह जकारटा रवानमी १० बजे सुबह डाधिन पहुँच बजे शाभ डाधिन रवानगी १० बजे रात १३ मवस्थर सिड्धती पहुँच बजे सुबह सिशती रवातगी ११०५९ रात १४ सवस्वर आकलेंड पहुँच ८-३० बने सुबह

कांग्रेस कार्य सभिति की बेठक से में ता० नवम्बर की संध्या को निपटा दी तीच

दिनों के लिये जबलपुर होकर में कलकत्ता पहुँच सफला था, परन्तु ता० की विषाली थी और दिवाली के दिन घर से रवाना होना उचित बात जान पड़ी अतः थीच के पृ दियों को कलकत्ते में बिताने का नि*ुघय कर ता० नवस्थर को दिहली से हुवाई जहाज

, हरा कलकत्ता गया पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल श्री ज्ञा० कैलाश माय कादलू को जब भारतीय संस्तद के मंत्री श्री काल ने कलकत्ता होकर भेरे न्यूजीलेंड जाने की बात लिखी तब श्री काटजू साहब से मेरा निकट का संबन्ध होने के कारण उन्होंने सूझे गयर्ममेंट हाउस में 5हरसे के लिये निमंत्रित किया। ता० के तीसरे पहुर से ता०११ के उष:काल तक में कंलकते के गवर्तमेंट हाउस में हरा और इस काल में डा० काटजू ने पेरा जो आतित्थ्य सत्कार किया उसके छिये में उन्हें किस धाह्दों में पम्यवाव हू

[१०

सुदूर दक्षिण पु

ता० ११ को ४॥ बजे प्रातःकाल जाने वाले हवाई जहाज के लिये डमडम के एसेड्स पर ३॥ बजे पहुँच जाना आवश्यक था यद्यपि में सदा ही उप/काल में उठ जाने का अभ्यस्त हैं, परन्सु उब/काल का अर्थ होता है बजे के आसपास। ३॥ बजे हवाई अड्डे पर पहुँचने का मतलब बजे गयर्ममेंद हुडस से चछदा और देर से बेर २७ बजे उठकर शौोचादि से निवुंच होना था। उस दिन कलकते में मेरी बिदाई के भी कई सभा" रोह थे- बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से, बड़ा बाजार कांग्रेत जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से, माहेश्यरी भवन में जनता की और से अन्तिम समारोह से लगभग ११ बजे रात को में गवर्नसेंठ हाउस लोदा यद्यपि राज्यपाल ए० डी० सी० को मेरे २॥ बजे जगा वैने तथा बजे मोटर से एरोड्रोम ले जाने की सारी व्यवस्था की आज्ञा थी, पर मुझे एक क्षण को भी चींद आयी और में दो बजे ही एरोड्रोम पर जाने के लिये तैयार हो गया। इसका फंदाचित्‌ एक कारण यह भी था कि स्टेशन, हवाई अडडे इत्यादि गाड़ी अथवा हुथाई जहाज आदि की रवावगी के कप्त से कप्त ४५ क्‍झिलिद पहले पहुँच जाने की मेरी आवत हो गयी है कई सिन्र मेरे इस आचरण पर हुँसा भी करते हूँ और मुझे देहाती कहते हैं। परन्तु मेरा यह निश्चित संत है कि ऐसे स्थानों पर सदा अपने समय की गुँजाएइद रख कर पहुँचना चाहिये, जिससे यदि रारते में मोटर पंक्चर हो जाय अथवा इसी प्रकार की कोई बाधा आा जाय तो भी रेल य/ प्लेन चुके सुझे इस बात पर थोड़ा सा अभिमात है कि में कहीं किसी काम के लिये बेर से नहीं पहुंचता और अत्यधिक यात्र। करते रहुने पर भी आज तक कभी भी मेने कोई गाड़ी था विमात नहीं चुकाया

जब २॥ बजे राज्यपाल ए० डो० सी० सुझे जगाने पहुँचे तब सन्‍्हें देखकर यह भादचर्य हुआ कि में जाने के लिभे तैयार या मेरे छोटे पुत्र जगधीहनदास के मित्र डापटर गुलाब चन्य चौरसिया, जी हाल ही में अमेरिका से अपना विद्यार्थी जीवन समाप्त कर छोटे थे सुझे पहुँचाने मेरे साथ बिल्ली से कलकत्ता जाये थे और मेरे साथ ही गवर्वेमेंद हाउस में ठहरे थे जब तक हस दोनों सामान के साथ मोटर में बेढें तब तक मेरे पुत्र सत- पोहनदास, श्री सन्त कुमार तिवारी, मेरे दामाद धसदयासदास, उसके पिता श्री मोवर्षत बासजी बिस्वानी आदि भी गवर्वमेंट हाउस गये और हम सब लोग निष्चिचत किये गए ससय ३॥ बजे डसडस के एरोड्रोम पर पहुँच गये

हवाई जहाज ठीक समय पर कलकसा पहुँच गया था भारत में चलने वाले डकोटा' दो पंजिन बाले वायुयान सें में बहुधा यात्रा किया करता हूँ, पर यह बायुयात उन हवाई जहाजों से कहीं बड़ा था इसमें चार एंजिन थे और चालीस यात्रियों के बेठने का हथात

लॉ ८04 १४ ; हे

सुदूर बक्षिण पूर्व

पासपोर्ट और हेजे तथा माता के टीके के प्रमाण पत्रों की आंच एवं कस्टम्स सुह्ठक्ने में साभाम जादि के निरीक्षण में गेश घोड़ा सा समय भी गे गया, क्‍योंकि मे ऐसे कार्य से जा रहा भा, जिसमें इस झगड़ों ते निर्यात का भार सरकार जे लेती है

वायुयान सह्षपि ४॥ बजे रवाना होते जारय था परम्तु समय पर रचाता ने हो सका मुझे विदा करने आने बाले किसी भी व्मक्ति को उस समय अन्य कोई काये ने था जौर सभी यही चाहते थे फि उस पिन सुझरे थी भरकर अधिक से अधिक बातें कर लें, फिर भी जहाण की रानगी में जो पह देर हो रही थी, वह किसी को भी रविकर ने थी; में जाने बाला था अतः मुझे एछविकर हो यहू स्वाभाविषा था, पर जो मुझसे जी भर फर बातें फरना घहते थे उन्ही भी नहीं भिव्चित होने बाली बात में उसके अभिय होने पर यदि घिलाम्म ऊगने लगता है तो भी जनण्य ऊब उठता है, यह एक भनोवेज्ञासिक सत्य हे

लगभग बच्चे हमाई जहाज में बेठने की पोषणा हुई मुझे छोड़कर शेष समस्त पत्नी योरोपियन थे जो सुजे जिया करने आये थे उप सबरे सिल मेंढ कर में जहाज बैठा ५॥ बजे विभान रधाना हुआ दियाली के घाव की द्वितीया का प्रातःकाल था फलकसे का समय स्टेंडर्ड छाइस से २४ लिभित आगे होने के कारण नवम्थर मास में भी उष:काल का प्रकाश चारों ओर फैल गया था। आकादा मिर्मेल था ओर ठंडी ढंडी' धॉयु बल रही भी जब एशेप्लेश घला और उसकी खिड्टकी में से भेने अपने पहुँचाने बालों को देखा तब उनके मुझखों से उनके भारी हुथयों का हाल छिप ने सका। खासकर मनमोहन के मुख पर उनकी उस समय की भावनाएं रपष्ट रूप से अंकित थीं। में अपने को अनेक इष्टियों से बड़भागी मानता हूं पर राजे अधिक इसजिये कि में सर्वत्र ही अत्पाधिक स्नेह का पात्र रहा हूं। अमेफ सतन्ेदों के रहते हुए भी भेरे कौटुम्मिक जीवन में जो प्रेम का प्रणाह रहा है उसमे सारे शतभेदों को बहाकर मेरे कौदुम्चिक जीवन क्षी अत्यजिक उसी रखा है और एक बात ओर साता-पिता का अपनी संतति पर जितना स्नेह रहता सं्ति का माता; पिता पर नहीं। परन्तु कवायित्‌ में उन बिरजे व्यक्तियों में हुं जिनकी संतति का भी माता-पिता पर भाता-पिता के स्नेह से कम स्नेह भहीं रहता

११ ]

28 री

डी ही वेश में हमारा विभाभ कोई १०००० पद वी कऊंपाई पर छह गया शीर छगशंग २७५ भीछ प्रति घंटे को रफ्तार से उठते छगा। इसनी बुर किसी भी छुमुम्बी था मिन्र अथवा संगी साथी के वसा अकेले मेरी यह पहुली याज्ञा थी। यद्यपि इस दिनों अकेले रेख अथवा एरोप्लेन में मे अगेक बार यात्रा किया फश्ता था, पाँच बार की जेल मात्राओं थे भी कई बार अकेला रखा गया था, पर घस अकेले पम और इस अकेऊेपल में जब सुझे स्थयं ही कुछ अस्तर जान पड़ा सदा इस प्रकार की यात्राएं करने बालों के सन पर गाते इस प्रकार दे: अक्ेलिपण का कोई प्रभाव ने पड़ता हो, वए इसके भी अध्यास की आवश्यकता होती मुझे आज अपने जीवन की अनेफा घदयाएं याद आगे लगीं। माताओं ने मुझे आशी- बाद का जो पत्र कलकता भेजा भा उसमें लिखा था, मुझे बहू जमाना याद आता है जब बिना बीस पच्चीस संगी साथियों, वौक्षर पाकारों के तुम्हे कहीं बाहर नहीं जाने विधा जाता था ठीक लिखा था उन्होंने मेरे जीवन का एक पहु अध्याय भी था। सार्वभ्षतिक जीवम में प्रवेश करने के पश्चात्‌ भी याजा में कुछ कुछ नौकर चाकर, संगी साथी रहते थे, अर्देली तो बहुत रामय तक और पहु अगली बड़े गइरों में सड़क तक पार करने में मुझे सहायता बेता था। सन्‌ १९२९ में एक बार जब मे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के लिये लखनऊ गया था और एक दिन अर्ईली साथ रहुने के कारण सुझे सड़क पार करने में असमंजस हुई थी तब पेरे सित्र प॑० हाए्काशसाद जी भिभ्र मे सेश खूब सजाक उड़ाया था। मुझे जपना चहू समय भी याद जाया सत्‌ ३० में जब में जेल में सर्वश्वते अकेला रखा गया उस समय की घदमाएं भी सेरे मत में उठी और आजकल जो में ममेक घार अकैले यात्रा किया करता था थे प्रसं। भी याद आये। तो पीरे धौरे सुझे पुराने ढंग के सहारे की आवश्यकता मे रह गयी थी यहु तो स्फश था, पर फिर भी अब तक में जित परि- स्थितियों में भकेला रहा था उससे और आज की इस परिस्थिति में भुझे अन्तर जान पड़ा बहुत बेर तक इस अन्तर का कारण मेरी समझ सें ने आया; पर एफाएक सुझे बहू कारण

[१३

चुवृर दक्षिण पूर्ण

ज्ञात हो गया अब तक थदि भें कहीं भी अकेला रहा था तो अपने देश की भूमि पर चाहे मेरी जान पहचान वाले मेरे साथ हों, पर मेरे देश के सिवासी किसी किसी रूप में मेरे आस पास अवश्य रहे थे। आज में जा रहा था देश के बाहुर, अपने वेद के एक भी साथी के बिना। सवा नौकरों चाकरों, संगी साथियों से घिरे रहुने के अभ्यास से मुफ्त हो अपने देश में ही अकेले २हने की स्थिति का तो सुझे अभ्यास हो गया था, पर अपने वेश के बाहर अपने देश मिवासियों के संग से रहित इस प्रकाश अकेले रहने का यह पहुला प्रसंग था और इसका उस समय मेरे मन पर कभ प्रभाव ते पड़ा इस प्रभाव को भेरी घिवाईं के उम समारोहोंने तथा मेरे कुटदुम्बियों ने जिम भार हुवयों से मुझे बिदा किया था उस सारे संस्मरणों ने और बढ़ा दिया और फुछ देर के लिये में व्यधित सा हो गया

भौसम बड़ा अच्छा था मे बादल थे और ने वायु में ही किसी प्रकार का वेश था चायुयथान काफी ऊंचा उठ चुका था और उसकी चाल भी काफी तेज थी, पर इस शांत वायुभंडल से बिना थोड़े से भी जंपिण के यहु इतनी गांति से चल रहा था कि जब तक खिड़की में से नीचे मं देखा जाय और नीचे की बड़ी बड़ी चीजे खिलौने के रूप में जोर से पीछे की ओर भागती हुई दिख पड़ें तब तक जान पड़ता था जैसे घह विभान बिना हिले डुले निकल खड़ा हैं। हवाई यात्रा क्षा अभ्यास होजाने के कारण अब सुझे हुवाई- यात्रा के कारण क्ष्वस्थता (एयर सिकनेस) होती थी और कामों में कोई कष्ट रात को मुझे जरा भी नींद ते आयो थी अतः अपनी उधेड़ बुन में गोते लगाते लगाते में अपनी सीट पर बैठे बैठे ही सो गया कितनी देर सोया यहु तो में नहीं कह सकता, पर उठा तब जब एरोप्लेन की स्ट्अर्डेस ने मुझे कलेये के लिये सठाया। इतनी उधेड़ बुन के परन्‍्चात भी सूझे बिना सपनों वाली गहरी नींद आयी थी। इस नींद ने भेरे शरीर को हो आराम नहीं पहुँचाया, मेरे मन को भी शांत कर विया।

कलेया अधिकतर भांसाहारियों के लिये था जब मेंने स्टूअशंस से कहा कि भे कहुर गाकाहारी हूं और वह मुझे ऐसी चीजें वे जिसमें मांस हो, मछली और अंडा, तब बहू मुझे बबल रोटी, भक्खन और चाय के सिवा और कुछ दे सकी कलेबे में थोड़ा सा दूध लेने के सिवा अन्य कुछ खाने की मुझे आदत भी थी अतः जो कुछ भुझे मिला, वह मेरे लिये काफी था

फिर से भेरशा मन उसी प्रकार की उद्विस्नता में ते पड़ जाय, इसलिये खा पोकर भेने पढ़ना आरम्भ किया। कासनवेल्थ पालिमेंटरी कॉफ्रेंस के सन्‌ १९४८ के पिछले अधिवेशन की कार्यवाही पढ़ता सेरे लिये आवश्यक था और एरोप्लेन में वही पढ़ने के लिये में लाथ! भी था। लंच (दोपहर का खाना) का समय बजे होता हैं पर ११। बजे ही छाने पीने

१४ ]

सुदूर दक्षिण पूर्व

का सामान गया। इतने जल्दी खाने की व्यवस्था पर मुझे आइचर्म भी हुआ, पर बाकाहार में जो हबल रोटी, दसादो, फूठ-सलाड इत्यादि हुलकी चीजें थीं वे जल्वी भी खाई जा सकती थीं अतः सेने खाना समाप्त करना ही उचित समझा

सिंगापुर विमान बजे पहुँचने बाला था। कलकते से देश से रवाना होनेके कारण भेरा खाल था कि और भी कुछ देर से पहुंचेशा पर जब मेरी घड़ी कोई सवा बारह बजा रही थी तब एकाएक एरोप्लेत की घाल धीमी हुई और उसने उतरना आरम्भ किया साथ ही सामने वे अक्षर लमकने लगे जिनके हारा हुबाई जहाज के घढ़ते और उतरते समय सीठ के पंद्टे को फल्तर बांधने की हिदायत बी जाती है

में कूछ घबरा सा गया दो ढाई घंटे पहिले वायुयाव क्यों उतर रहा है, कोई एंजिन का क्षगड़ा है या अन्य कोई बात योरोपियन सभ्यता के मिथमों के अनुसार बिना इस्द्रीडकशन' के एक दूसरे से बातचीत नहीं होती ऐसे भी किस्से सुने गये हें कि यो व्यक्ति वर्षों एक बूसरे के आमने-सामने के सकानों अथवा होटल के कमरों में रहे पर उन्होंने 'इन्ट्रोडकान' थे होने के कारण कभी एक दूसरे से बात थे की। पर एरोप्लेन के एकाएक उतरने के कारण जैसी परिस्थिति की मेने कल्पना की थी उस परिस्थिति में सभ्यता के ये बन्धन ढीले ही नहीं हो जाते, टृठ भी जाते हैं भेंने जब अपने एक अंग्रेज साथी से बिता इन्ट्रोडक्शनो के ही वायुवान के उतरने का कारण पूछा तब उसने बताया कि सिभापुर गया और जब मेने फहा कि दो ढाई घंटे पहिले ही, तब उसने उत्तर विया कि सिंगापुर का समय करके के समय से दो घंदे भागे है एरोप्छेल ठीक सभय पर ही सिगापुर पहुँच रहा है

अन्य यात्रियों के समान में भी उत्तरने की तेयारी करने छगा और इस तेयारी में सब्षप्ते पहिले मेंते अपनी घड़ी के कांदों को दो घंटे आगे बढ़ाया यह कहा जाता है कि २१४ घंदे के दिन और रात में जाएँ किसी ऋतु में दिन बढ़ जाय॑ या रातें, प९ समय क्षणमात्र भी ने बढ़ता है और घदता तथा दिन और रात के सदा २४ घंदे ही रहते है। यह बात एक स्थल पर रहने बालों अथवा छोदी भोदी यात्राएं करने बालों के लिये ठीक है, पर ऐसी हूम्बी यात्ाओं के यात्रियों के लिये तहीं। देखिए आप ही, हमारे लिये २४ घंटों का दिन २२ धघंदों का रहू गया। यदि हम सियापुर से कलकता आते होते तो २४ घंदों का दिव २६ घंटों का हो जाता

[ १५

इदुलकता से सिगापुर की यात्रा घंदे की लिखी हुई थी, परल्तु घिगापुर का सप्तय दो घंटे आगे होने के कारण इस यात्रा में यथार्थ में घंदे ही कंगे थे इत घंटों की यात्रा बड़े सुख से हुई थी। मौसम बहुत हो अच्छा होने के कारण तथा हमारे विमान का आकार अत्यधिक बिश्ञाल होने की वजह से और उसके १५००० से १८००० फुद की ऊंचाई पर छड़ने के कारण एक बार भो बंधिग नहीं हुआ था। किर भी ऐसा जान पड़ता था जैसे यात्रा में दिन महीने और वर्ष ही नहीं, युग बीत गये हों। साथ ही प्रिय जनों को छोड़ ने जाने कितनी दूर आना हो गया हो, सात-सात घंदे की विधान की यात्रा में इसके पहुले भी कई बार कर चुका था, परन्तु इस समय मन में जेसी भावनाएं थीं वेसी इसके पहले की यात्राओं में कभी ने उठी थीं जब में एरोप्लेन से बाहुर निकला उस समय सर्वे प्रथम सिंगापुर के भारतीम प्रतिनिधि घान और सिभापुर के व्यापारी प्रतितिधि श्री सरदार जोगेग्रासिहु भिले, भारत सर» कार के आवेशानुसार ये लोग मुझे लेने के लिये हवाई अड्डे पर जाये थे। कितना हरे हुआ मुझे इस भारतीयों को यहां देखकर भारतवासियों को छोड़े अभी सुझे केवल घंटे ही हुए थे, पर इस घंटों के बाद जो दो भारतीय दिख पड़े, जास पड़ा जैसे यूभों के पश्चात्‌ भारतीयों के वर्जन हुए हैं यहां भी पासपोर्द और टीकों के प्रमाण पन्नों की जांच तथा कस्टम्स में साधान के निरीक्षण सें कोई समय नहीं रूगा यहाँ से इस दो भारतीय प्रतिनिधियों के साथ में उस होटल में पहुँचा जहां मेरे ठहरने की व्यवस्था थी।

हमारा विभान दूसरे दिन भ्ात:काछ बजे जानें वाला था अतः श्री भात ने ४॥ बर्ज संध्या को सुझे खिगापुर घुसाने का निश्चय किया। मेने स्वानाबि से छूटी पाता तंग किया |

१६ |

सुदूर दक्षिण पूर्ष

स्वानकर मेने संध्या पुजा भी को, पर इतनी देर से संध्या पूजा से निवुत्त होने की अपेक्षा मेने यह तय किया कि इस यात्रा में स्तान से संध्या पूरा का संबन्ध रखा जाय संध्या पुजा तो प्रातःकाल भोजन के पहले ही हो जाना चाहिये और जिस जगह भी हो उस जगह स्वान मौके से ही हो सकते है तथा संध्या पुज्रा के बाद भी

कजकते से जब हमार हवाई जहाज रवाना हुआ उत्त समय आकाश एकदस स्वच्छ था सिंगापुर पहुँचने तक बादल भी जिले थे, बर सिमापुर के आसपास कुछ बादल अवदब्य दिखायी देने लगने थे सियापुर पहुँचने ही घटाएँ उठी और जब से सिगापुर के होटल में स्वान कर रहा था उस समय मेघों ने सिधाधुर की भूमि को भी स्तान कराना आरख्भ किया। पानी काफी जोर से बरसा, जिसके कारण श्री घान ४॥ बजे आकर ५। बे के लगभग पहुँच पाये। मालूम हुआ कि यहां बारहों महीने इस प्रकार पाती करी भी बरक्ष जता हैं जब श्री भान होटल में पहुँचे उस समय में बाहुर जाने को तैयार होकर बैठा था। पानी भी एक गया था अतः श्री थाने के साथ से सिगापुर देखने के छिये उनकी भोदर में रवाना हुआ

सिंगापुर की आज की घुभाई में द्ाहर के बाजारों और सड़कों को छोड़ हम छोग तीत विशिष्ट स्थानों की गये। एक यहां के बुदेनिकल' बगीचे को, दूसरे सिंगापुर में लगी हुई भमलाया की जमीदारियों में से जूहू नामक एक जमीवारी को और तीसरे रबर के संगरीले को

सिगापुर में सबसे पहले मेरा ध्यान जिस वस्सु ने आकर्षित किया वहू एक विचिन्न बुक्ष था। इसके पते ठीक केले के पत्तों के सदुध्द थे और चक्ष का आकार था ठीक पंले ये; समान मुझे यह वृक्ष बड़ा सुन्दर जान पड़ा मैंने अब तक इस प्रकार कर वृक्ष कहीं नहीं देखा था। इस वुक्ष से मेरी इस प्रकार की दिलचस्पी देखकर ही भी धान मुझे बुदैनिकर्ला बंगीये में ले गये और यहां उन्होंने मुझे एक चिचित्र बुक्ष और दिखाया जिसके पत्ते के नीजे के इंडल एकवम लाल होते हें और इस लाल डंठलों पर बेस के वृक्ष के पस्तों के सवृत्ष हर प्ले बड़े लुभावने जान पड़ते हैं। बुटैनिकल' बाग भी बड़ी छुल्दरता से लगाया गया है

आह जमीवारी सिंगापुर से रूजग १३४ भील दूर है और समुद्र पर लूगभग मौज का पुल है. जिस पर से होकर इस जमीदारी में जाना पढ़ता है समुद्र के इस पुछ को वेश्कर मुझे रामायण के सेतु बर्च की कथा का स्मरण आये बिया रहा

सिंगापुर अपनी भौगोखिक स्थिति के कारंथ अच्तरीष्ड्रीम दुष्दि से बड़े महुत्त का हथार है। संसार के बड़े से बड़े बंदरगाहों में यह भी एक हैं सिंगापुर पूर्वी गोला४

( (७

सुदूर वर्षिण पूर्ण

का सबसे विशाज शमी अदटा है बड़े से बड़े युद्ध-पोतों की गरम्भल के लिए सुखे डॉक्‌ ( कएए तेठण॑:5 ) यहाँ हैं। पानी भरे हुए डॉक ( छूट; त0८ॉ:3 ) में जहाजों के ग्रेड ठहरने के लिये बड़ी अच्छी सुविधा हैँ समुद्री-शक्ति का अन्तर्राष्द्रीय केक होने के कारण बिवेशी आभणणों से रक्षा की पूर्ण व्यवस्था सिभापुर में है द्वितीय महायुद्ध में जापावियों ने समुद्र से आक्रमण करने के बदले जमीन से आक्रमण किया उस समय केबल समुद्री आक्रमण से रक्षा करने के लिपे सिगापुर सें उचित ग्यवस्था थी अब इसकी ध्वस्या की जा रही है कि जमीन, समुद्र और हवाई भाक्रमण से सिंगापुर की सदा रक्षा की जा सकते

ओकीमाबा, हॉँगकांग, सिंगापुर और कोलम्बो पूर्वी गोलार्ष के समुद्री अड़ों फी समसे प्रबल्ल शुंखला है। इन केखों पर आस्ट्रेलिया, न्पूजीलेड, इन्दीनेतिया, स्माम, भारत, बर्भा और छंका सभी की गिद्ध-बृष्टि लगी रहती है। हिन्द महासागर और अश्ञात्त महासागर के बीच सिगापुर की स्थिति गर्पन्त महत्वपूर्ण है

सिापुर भछाया देश का ही एक भाग हूँ परम्तु अन्तर्राष्ट्रीय वृष्ठि से महत्तत रखने के कारण भलाया की सरकार से इसकी सरकार को अलूग कर दिया गया है

सिगापुर खूब फैला हुआ बसा है अत्यन्त साफ सुथरा है। पर सड़कें काफी चौड़ी है और मकान मथेष्ट रूपए से बड़े शहर देखते ही उसकी संपन्‍्तता छिपी नहीं रहुती सिगापुर की आबावी करोब दस लाख मनुष्यों की है जिनमें ११९६२१३ सलगयी, ७६१९६२ चीनी,७०७४५९ भारतीय, २०६४९ योरपियन तथा युरेशियत और ७८४५ अच्य हैं धलयगी सिगापुर के भूल निवासी हैं और शेष समुदाय बाहुर से आये हुए बाहर से आने बालों में चौनियों का बहुमत हो गया है

भलगी साधारण कद के गेहुएँ वर्ण के मनुष्य हैं; आँख नाक और चेहरा मंगोल जाति से मिलता हुआ। आतंद पुर्वेक रहना और कस्त से कम काप्त करना इसको विशेषता है भमलयी लोगों में पुरुषों से स्थियाँ कहीं अधिक' काम करती हैं; पुरुष तो शाहुब की मक्खियों के नरों के सवुश अधिकतर अलमतस्त पड़े रहते हैँ। दुकानें चछाना, सौदा लैसा और बेचना, घर का काम सभी अधिकांश में स्नियां करती हैं सलयों की अपनी भागा है और अपने शीति रिवाज पोमियों ने अपनी भाषा और अपने रीति श्वाओं को फायत रखा है शारतीयों में हिन्दू और भुसलभान दोनों हैं; बक्षिण भारत के लोग अधिक और सबसे कम ग्रोरपियन शोसे पर भी राजनेतिक दृष्टि से सबब से अधिक महत्वशाली ओऔरपियम हैं

१८ |

सुंदर दक्षिण पुन

भलगयी, चीनी और भारतीय तीनों का आपसी संबन्ध बुरा नहीं है पर तीनों मिलकर योरपियनों को बुरी दृष्टि से ही वेखते हें; इसका सुर्य कारण योरपियतों की इतवी कस संख्या होने पर भी योरपियनों का राज सत्ता अपने हाथ में सुरक्षित रखता हैं

सिंगापुर में चार भाषाओं का प्रचार है--मलयी, चीमी, तामिल और अंग्रेजी पर बाजारों के साइनबोर्डों आदि पर दो ही भाषाएँ दृष्टिगोचर होती हँ-चीनी और अंग्रेज़ी

शिक्षा, सफाई, आरोग्यता आदि की दृष्टि से सिंगापुर काफी अच्छी स्थिति में है अपडढ़ों की तंख्या यहां नहीं के बराबर है हाल ही में सिंगापुर ने अपना विश्वविद्यालय स्थापित किया है

यहाँ के प्रधान व्यापारों में तीन व्यापार हुं-रबर, टीन, शरीर अनानास रबर के बगीचे है, जहाँ पहुले रबर के वृक्षों में छेब कर उनमें छोटी-छोटी हंडियां बांध ताड़ी के सदुश उनका कूध निकाला जाता है। फिर यह वृध रबर के कारखानों में आकर वहाँ रबर तेयार होती हैं टीन की कच्ची घातु को गलाकर टीन तैयार करने के यहाँ कई कारखाने हैं।

इसी प्रकार अनानास को सुरक्षित कर डब्बों में पेककर भेजने के भी कई कारखाने हैं।

रबर, ढीन और अनानास के सिधा इमारती लकड़ो, इंट, रंग, ताड़ी, बिस्कुट, सावन, नारियल का तेल, मूंगफली, फर्नीचर, एल्यूस्रीसियम की चीजें और एसबेस्डस के भी यहाँ कारखाने हैं; पर प्रधानतया रबर, टीन और अनानास के ही |

रबर, टीन और अनानास का भलाया के भिन्न-भिन्न स्थानों से बहाँ जायात होता है और इस सामग्री के सारे निर्यात का यही बच्दरगाह है सिगापुर के लोगों के खाने के लिये चावल और पहनने के लिग्रे कपड़ा विदेशों से जाता है प्रधानरूप से सिगापुर एक बड़ ब्यापार-केस्त और महत्वपुर्ण सैनिक (४:7३४:८४४०) अडडा है

सिंगापुर होप है करीब २६ सील लम्बा और १४ मील चौड़ा समुद्री और सम आन हुवा है तथा खूब वर्षा होती है। तापमान में अन्तर बहुत कम्म रहुता है; ८७" से अधिक और ७४" से कम तापभान