पुस्तक-विक्र ता

तु 6 नंदकिशोर ऐंड ब्रदस, चौक, ब॒नारस;। द्वितीय आवृत्ति मूल्य(४॥)

सु दर फू++ कृष्णगोपाल केडिया[- वणिक प्रेस, साक्षीचिनायक, बनारस !

हिंदी के अनन्य उपासक ओर सच्चे पंथग्रदर्शकः स्वर्गीय पं० रामचंद्र शुक्र को पुण्य स्मृति में उन्हीं के छात्र द्वारा सादर समर्पित

अनिफेथन

भारत में अंगरेजी राज्य की स्थापन्ता होने के अनंतर यहाँ

की पुरानी विचार-पद्धति बदलने लगी, जिससे सबसे पहले हसारी घार्मिक मनोवृत्ति में अंतर उपस्थित हुआ इसके फलत्न- स्वरूप हम व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना से कुछ कुछ दृष्टि हटा- कर न्‍्यनाधिकरीत्या अपने लोकिक जीवन की ओर जुड़े देश की दृष्टि राजनेतिक हुई और अपत्ती दरिद्रता या आर्थिक स्थिति सामने खड़ी हुई। यद्यपि भारत में सामाजिक दृष्टि को बदलने के लिए कितने ही आंदोलन आरंभ में हुए तथांपि सबसे व्यापक प्रभाव स्वासी दयानंद के आंदोलन का पड़ा, क्योकि उसका आधार भारतीय था ओर वह हमारी संस्कृति की रक्षा में भी दत्तचित्त था। विदेशी घमप्रचारकों के कारण जो विच्छेद की संभावना बढ़ रही थी ओर रूढ़िवादी लोगों की कट्टरता से सासाजिक-धार्मिक दशा जो गिराव का रूप धारण करती ज्ञा रही थी उसके निराकरण का काय इसके द्वारा सबसे अधिक बलशाली हुआ पढ़े-लिखे लोगों पर इसका बहुत अच्छा और “यापक प्रभाव पड़ा, विशेषतया पंजाब में फल यह हुआ कि

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साहित्यिक रचना करनेवालो को मनोवृत्ति भी वदलने लगी हि उन्होने जब अपने साहित्य की ओर देखा तो वह खल्लार का वासनामय रचना में ही विशेषतया लिप्त दिखाई पड़ा ला डसका त्याग करके नूतन परिपाटी पर खाहित्य को बढ़ाने के आवश्यकता प्रतीत हुईं ओर रचयितागण उसमें संलगमम होने लंगे। इन्होंने पद्म को ही प्राचीन कवियों की भाँति अपने विचारों का व्यंजक नहीं रक्खा, वर्न्‌ गद्य को भी अहण किया | तो भी पद्म का श्रसाव किसी को अविदित था। अतः अत्यंत प्रमविष्णु रचनाएँ जीवन का व्यावहारिक रूप सामने लोने के लिए पद्म से सी निर्मित होने लगीं। इस समय के सब से प्रमुख कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र थे। इनकी प्रतिभा से तत्कालीन अधि- कांश साहित्यकार चमत्कत थे ओर इन्हीं की परिपाटी पर चलने का प्रयत्न करते थे। इस प्रकार आरतेंदु हस्श्चिंद्र और उनके अनुयायी कवियों के छारा हिंदी-काव्य में नूतनता क्रा समावेश हुआ यह नूतनता सामाजिक, राजनीतिक ओर आर्थिक विषयों से संवंध रखनेवाली थी साहित्य की सीमा इसके समावेश से विस्तृत हो गई ओर हिंदी-काव्य सें अपेक्षित आधार-सूसि पर फेल गया। हमारे साहित्य के लिए यह कार्य निश्चय ही संगलमय हुआ पुरानी कविता सें विषय को दृष्टि से चाहे कमी रही हो, पर जिस भाषा में वह निर्मित हो रही थी उसकी मधुरिमा, सरलता आदिके गुणों से सभी परिचित थे | ब्रजभाषा, अवधी आदि में कइ सो वर्षों से रचना होती रही थी और उन्हे हिंदी के अनेर समथ कवियों ने अपनी वाणी हारा सॉजकर परिष्कृत कर रखा था; अठः पथ के क्षेत्र मे भापा का परिवर्तन इन कवियों को अभीष्ट नहीं हुआ वस्तुत: उस समय के कवि नई-पुरानी बातों

|

२०

[ थे ]। की स्वभोवतः 'मिल्लाकर चलना चाहते थे। बांत भी ठीक थी विकास उत्तरोत्तर होता है। सहसा परिवतेन से अनथ दवोने की संभावना बनी रहती है। फिर नह विचार घारा के साथ नई भाषा सो जाय 'तो वह एक्काएकी अपना ग्रभाव डालने में सेसथ' भी तो नहीं हो सकती | इसलिए यह काम भी ठीक ही हुआ कि ब्रजभाषा आदि में ही उस समय की काव्य-रचनाएं होती रहीं। उसे युग में निश्चय ही लोग सोर्संजस्य-बुद्धि से काम कर रहे थे यह सासंजस्य सर्वत्र दिखाई देता है; विचारो, प्रणाली आर भाषा में भी बाबू अयोध्याग्रेंसाद खन्री पंडित महावीरप्रसाद हवेदी आदि ने यह आंदोलन उठाया कि गद्य और पद्य दोनो मे खड़ी बोली का वंयवहार हो सकता है ओर होना चाहिए। टिवेदीजी से इसके पहले अपनी रचनाएं व्रर्जर्भा्षा में ही लिखी थीं आर अधिकांश लोग ब्रजसापषा में ही उस समय तंक रचना कर स्हे थे।१ इस आंदोलन के चलने का प्रभाव यह हुआ कि कुछ लोगों 'ने इससे प्रभावित होकर खड़ी बोली में कविताएँ प्रस्तुत की ओर इसमें विविध प्रकार की रचनाएँ होने लगीं। छुंछ लोगों ने संस्कृत की पदावली पसंद की ओर उसके लिए सस्क्ृत के छुंद्‌ भी चुने किसी ने ऐसी रचना सतुकांत रक्खी ओर किसी ने अतुकांत कोई उद की बहरों की ओर गया ओर उससे अरबी- फारसी के चलते शब्दों ओर शैली की भी अहण किया। यदि किसी ने हिंदी के मात्रिर्क छंदो मे ही खड़ी बोली को गाया; तो कोई अन्य त्रजभाषा के कवित्त-सबेयों में उसे ढालंने लगा। तौत्पय यह कि खड़ी बोली धीरे धीरे पद्म छे क्षेत्र में छा गई। तथापि ब्रजभाषा की भी रचनाएँ बराबर होती रहीं। खड़ी

< सनी हे ८5 दो ' -बोली वालों की बहुत सी रचनाएँ त्रजंभापा मे भी मित्रतों है।

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अब

खली बोली अधिकतर नई परिपाटी के विपयों के वरश्णुन में: प्रवृत्त हुई ब्रजभाषा में जैसे भारतेंढु-युग मे नए विपय लिखे. जाते थे वह बात अब नहीं रह गई है, यद्यपि कुछ रचनाएं

च्रज़भाया सें भी नए ढंग की हैं। खड़ी बोली पद्म के क्षेत्र में व्यवहृत तो अवश्य होने लगी पर उसमें अपनी परपरा का हो

बह रहा, यह नहीं कि कविता की प्रणाली ,भी बदले। केचल उद ढर॑ पर चलनेवालो में कुल बातें यत्र तत्र ऐसा अवश्य दिखाई देती थीं जिन्हे हम अपनी पुरानी पद्धति से भिन्न कह सकते है। पर उस प्रणाज्ञी का अहण भी अपने ढंग से ही हुआ। कितु रवींद्रनाथ ठाकुए की रचनाओं की ख्याति फेलती

आा रही थी, जिसका फल यह हुआ कि बेंगल्ला फे ढंग पर नई प्रणाली से रचना करने का श्रीगणेश हो गया। ऐसा हुआ तो उसी सस्रय जिसे “द्विेदी-युगः कहते है पर इसका विकास

और विस्तार आगे चलकर नवीन युग में हुआ तथा नए ढंग

के गीत, नए जतीक्षों का ग्रहण, रहस्थवाद की रचनाएं ओर नए ढंग की व्यंजक परदावत्ी दा प्रयोग होने लमा। इस प्रकार की रचना को लोग 'छायावाद? की कविता कहने लगे कुछ लोग तो सचमुच बड़े अच्छे ढंग की रचना करने लगे, जेसे पंत, प्रसाद, निराला, सहादेवी बसों आदि, पर वहुत से ऐसे भी थे जो ठीक- ठिकाने की कोई बात कहकर शब्दजाल में ही फँसे रह गए इस प्रकार आधुनिक कविता बदलते बदलते छायाबाद दक पहुंची इस ढंग की रचनाएं अब खड़ी बोली में ही होती है। प्रजभाषा को वहुत लोग छोड़ ही बेठे है। छायाबाद की रच- नाएँ भी गूढ शब्दों ओर भायों की अधिकता, अस्पष्टता और टेदेपन के कारण उठने लगी हैं। अब दूसरी ही मनोवृत्ति दिखाई दे रही है, जिसमे समाज के दलित बर्ग को कविता का-

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लक्ष्य बनाकर लोग 'प्रगतिवादी” नाम की रचनाएँ कर रहे हैं। अभी कहा नहीं जा सकता कि इन रचनाओं का खरूप क्‍या होगा, पर पहले इस प्रकार की ऋतिवादी या प्रगतिवादी रचनाएँ. “छायावादी? पदावली में होती थीं ओर लोगों के लिए अनुकूल नहीं पड़ती थीं! अब ये रचनाएँ ऐसी सादी हो रही है कि लोग इनमें काव्य तत्त्व की कमी पा रहे है, क्‍योंकि नम्न वास्त- विकता के साथ इनमें साहित्यिक गौरव का प्रायः अभाव रहता है। कबिता तभी अच्छी हो सकती है जब उससे भाष की सचाई हो ओर साथ ही भाषा में भी कुछ सजाव हो+ पर केवल सजाव ही स्तजाव ठीक नहीं।

प्रस्तुत पुम्तक में इन सब बातों का विस्तार के साथ विचार ओर विवेचल किया गया है। आधुनिक हिंदी-कबिता पर जीवन की विभिन्न धाराओं के अनुरूप विस्तृत विचार करने- वाली यह उत्कृष्ट पुस्तक है। इसमें अपने मत का प्रतिपादन करने के लिए सुव्यवस्थित तक तो दिए ही गए हैं, आवश्यक उद्धरण भी है उद्धरणों की उत्तमता के विषय में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह खरुचि की बात होती है। ल्लैखक की पद्धति बहुत ही स्पष्ट ओर विद्वतापण है। हिंदी से इस पुस्तक का यथोचित मान होगा इसकी पूण आशा है।

प्रंथ मे भारतेंदु-युग, ठ्िबेदी युग ओर वर्तमान युग को लेकर विविध विषयों के अनुसार त्ैखक ने प्रकाश डाला है। वंतंमांन काव्य को महत्त्वपूर्ण मानकर उसने उसकी विवेचना में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शव किया है ओर हरिश्चंद्र तथा द्विवेदी य॒गों पर प्राप्त सामग्री की कमी ओर तत्कालीन कवियों द्वारा परमोच्च भावों के स्वल्प प्रदर्शन के कारण अधिक नहीं लिखा है। प्रथम दो युगों के कवियों का कथन कम ससभा जा सकता, कितु यह

कमी वर्तमान युग संबंधी उच्च समालोचना से पूरी हो जाती है | “कुल मभिल्लाकर विघार-स्वातंत्य, नवविचारोंत्पादन, संहंदय 'काव्य-कथन तथा उच्च समालीचनों के लिए ग्रंथ द्रष्टटय तथा लेखक धन्यबादाह है

है [ श्यासमंविहरी मिश्र मिश्र-भवल. | | (शवराजा, डी० लिंटू०, गोलागज, लूखनेऊँ, +# पसिश्रबंधु + रायँबहांदुर ) है कृदेव 2 वि >> «- &५ -ए० अगस्त, श्यछ३ 6 |. शुकदेवविहारी मिश्र है रायबहाँदुर )

वक्तूव्थ

'प्रस्तुत पुस्तक आधुनिक काव्य की प्रवृत्तियों की प्रगति ओर 'भिकास पर लिखे हुए निबधों का संग्रह है। एकान्विति और -घाराप्रवाह के लिए थोड़ी-बहुत पुनरीबवृत्ति भी हो गई है सन्‌ १६४० में श्रद्धय पं० रामचंद्र शुक्त की देख-रेख में हिंदू विश्व- विद्यालय की डी० लिट॒ परीक्षा के लिए अंगरेजी में लिखे गे

अबंध ( 0८४४७ ) के आधार पर इसका प्रणयन हुआ है इससें नवीन युग की परिवर्तित परिस्थितियों के फलस्वरूप नूतन दिशा की ओर प्रवाहित होनेवाली काव्यधारा के रूप को खसममाले की घेष्टा की गई है। इसी कारण प्रस्तुत पुस्तक में कवियों की कृतियों का इतिहास लिखकर आधुनिक कविता की अबृत्तियीं के क्रमिक विकास की ओर अधिक ध्यान दिया गया है। नवीन चेतना से जागरित कवियों ने अपने-अपसे युगीं के जीवन ओर विचारों को सामाजिक, धार्मिक राजनीतिक, ' आर्थिक तथा देशभक्तियुक्त कविता के द्वारा कौन सा रूप दिया, किस अकार के त्याग-महण तथा सामंजस्य बुद्धि के छा कैसा विकास और परिवतेन उपस्थित किया“-इसमें इन्हीं के निरूँपणु - का प्रयास किया गया है। इसमें प्रत्येक अज्वेत्ति के प्रभाव, हेतु

[

ओर, उत्तरोत्तर विकास का इतिहास देने का मेरा प्रयत्न रहा है। इस कारण कभी तो प्रमुख कषि छूट गए है और कभी सामान्य कवियों का उल्लैख हुआ है। इसी से जीवन की अभि- व्यक्ति से विहीत आधुनिक काल के ब्रजमसाषा के प्रधान कवियों | का विवरण नहीं दिया गया है। काव्यभाषा के पद पर प्रतिष्ठित हो जाने पर खड़ी बोली का इतिहास ही आधुनिक काध्य का इतिहास बन गया है। इसीलिए काव्यभाषा के पद्‌ से दूर अन्य विभाषाओ की सामयिक रचना को लक्ष्य से बाह्य समझा गया है। इसका अर्थ यह समकना चाहिए कि लैंखक अन्य विभा- जाओं को अनादर की दृष्टि से देखता हे प्रकृृत विषय की परि- मित तक ही अपने को रखने के कारण ऐसा करना पढ़ा है। अपने उद्द श्य की पूर्ति सें पुस्तक कहाँ तक सफल हुई है इसे साहित्य-ममज्ञ जानें। बड़े शोक के साथ लिखना पड़ता है कि पं रामचंद्रजी शुक्ल आज हसलोगो के बीच नहीं अपने दुभोग्य से ही आज लेखक को इसी बात पर संतोप करना पड़ता है कह्लि इस पुस्तक के पअकाशन हारा उसकी आज्ञा का पालन हो रहा है सब १६७४० में डी० लिट० की उपाधि मिलने पर श्रद्धा शुक्कजी ने इस प्रवंध को प्रकाशित करने का आदेश किया था, परंतु कुछ ही महीनों बाद उनका निधन हो जाने से उसका पालन - उनकी जीवितावस्था से हो सका अब इतने वर्षो" बाद इस प्रबंध का दिदी-रूपांतर पाठकों की सेवा में उपस्थित किया जा"

[| दे रहा है। विश्वनाथजी की ऋपा बिना कदाचित्‌ ही यह काये संपन्न हो सकता हे

भे इस अवसर पर उन सब लोगों के प्रति ऋृतज्ञता प्रदर्शित करना अपना कतंव्य सममभता हूँ जिन्होंने अपना अमूल्य समय नष्ट कर मुझे सदेव संहायता दी है। हिंदू विश्वविद्यालय के अंगरेजी-विभाग के प्रोफेसर श्री जीवनशंकरं याज्षिक, ठाकुर सुयकुमार सिह ओर पं० रामअवध हिवेदी ने मुझे निरंतर सत्परामशे से अनुग्रहीत किया है। डाक्टर रामशंकर त्रिपाठी आर डाक्टर बाबूराम मिश्र की समयोचित सहायता के लिए से अत्यंत कृतज्ञ हूँ

भारतेदु बाबू हरिश्चंद्र के दोहित्र बाबू त्रजरल्रदास बी० ए०, 'एलु-एल्‌० बी० अपने निजी पुस्तकालय के उपयोग की आज्ञा प्रदान कर अमूल्य सहायता दी है। उनकी इस उदारता के बिना प्रबंध के प्रथम खड की सामग्री दुर्लभ थी। लैखक इस पा के लिए उनका अत्यधिक कृतज्ञ है। प्रबंध लिखते समय पं० चंद्रबली जी पांडेय ने अपनी विद्वत्तापूर्ण संमति से मुझे बराबर कृतकृत्य किया है पुस्तक की अनुक्रमणिका बनाने में हिदी-विभाग के एमृ० ए० के छात्र बटेकृष्णु ने अत्यंत परिश्रम किया है

में अपने विद्यार्थी-जीवन के उन मित्रों को नहीं भूल सकता जिन्होंने निराशा के समय विनोद ओर उत्साह के द्वारा त्षिखते रहने की प्रेरणा प्रदान की है. कुबर राधवेंद्र सिह, कुंबर रिपु-

षे ] श्र

दमन सिंह, श्रीपाल वेश्य, और; पं० चंद्रशेखर: अव्नस्थी' बिना कह्दे- सुने ही सहायता दिया करते थे।

जिन सिश्रबंधुओं ने हिदी-खाहित्य की वर्तमान उन्नति में विशेष योग दिया है, जिन्होंने त्रजभाषा ओर खड़ी बोली की कविता+ समालोचना,- हिंदी-साहित्य का इतिहास, हिंदी-कवि- कीतेन, हिंदूधम के प्राचीन. भारतीय इतिहास, उपन्यास, नाटक, सामाजिक उपदेश, हिंदी-हस्तलिखित प्रंथों, की रचना करके साहित्य को. समृद्ध किया है उनके,ह्वारा लिखे इस पुस्तक के धप्राक्तश्नन” के लिए लैखक उनका विशेष कृतज्ञ है।

मैरे सहयोगी पंडित विश्वनाथप्रसादजी मिंभ्र के परिश्रम से: ही इस पुस्तक के प्रकाशन का अवसर सका इसका समस्त श्रेय मिंश्रजी को है ओरे पुस्तक की. तश्रुटियों का उत्तरदायित्व मुझ पर

(

हिंदू: विश्वविद्यालय, काशी॥ |

ऋष्िपंज़मी; २०००, ज्ि9- केंसरीनारायण' श्क्क

अध्याय-सूची

उपकऋम्‌ १-१५ प्रवेशिका रीतिकालीन काव्यधारा

प्रथम खंड ( प्रथम उत्थान )

१५-९ भारतेदु युग १७ राजनीतिक चेतना २८ आशिक स्थिति ३९ देशभक्ति को भावना ५१ सामाजिक परिस्थिति ६१ घामिक कविता ८४

भाषा, छंद और प्रक्रिया ८५९ ऊउपसंहार ९३

द्वितीय खंड द्वितीय उत्थान)

९-१९

द्वितीय उत्थान १०१ भाषा की समस्या ११३ १५२४

छंद की समस्या

है

पदावली का परिष्कार १२९ सामाजिक कविता १४२ घामिक कविता १५१ देशभक्ति की कविता १५९ प्राकृतिक कविता १७३ उपसंहार १८७ तृतीय खंड (तृतीय उत्थान) १९३-३२२ ब्रतीय उत्थान १९५

वर्तेमान काव्य की भावना २०३ वतंमान काव्य की प्रक्रिया २१३

रहस्यवादी कविता २२४ देशभक्ति की कविता २५८९ कऋरातिवादी कविता २७४८ प्रेम की कविता २८९ प्रकृति-चित्रण ३०६ उपसंहार ३२३-३ ३५ - उपसहार ३९५ अनुक्रमशिका ३३६-३४४-८

हिला काकारलााकपत * आया

है

आधुनिक काव्यधारा

विन

टः

प्रवेशिका

नवयुग की जागति ओर चेतना -के प्रसार के साथ-साथ आधुनिक .काव्य.की व्यापकता.भी उत्तरीत्तर बढ़ती जा रही है आज की कविता में जीवन की स्वोगीणशता लक्षित हीती है और आज का कवि सामयिक विचारों से ओत-प्रोत होकर उन्हें अप्रने भावों की अभिव्यक्ति का सफल साधन बजन्ना रहा है। जनता तथा समाज के अंधिकाधिक वर्गो' की भावाभिव्येक्ति का माध्यम बनकर नवीन .कविता सब के -ह॒दय पर अधिकार जमा ही है। आयः-सभी स्थिति ओर वर्ग के मनुष्य वर्तमान कविता के उपासक

चन रहे है

वर्तमान युग की कविता का -अप्रना महत्त्व है .नबयुग की जागरति का स्पष्ट आभास वतेमान कविता.की नवीन चेतना. में मिल रहा.है। वर्तमान युग की कतिता हिंदी-साहित्य के इतिहास में तवीन अध्याय का श्रीगणेश करती है। कवि विचार एवं अकिया के क्षेत्र में जूतत रसणीयता के अनुसंधान भें व्यस्त है। चर्तसाज्न कविता -लोक को जीवन के उत्साह, - स्थिति.की संकुलता खोर समस्याओं की जटिलता से -परिचित क़रा रही. है.। राष्टीय चैतना ससे जाग्रित -सम्राज-को वाणी का - बरदान देकर और जीवन की विविधता-.एवं अनेकरूपता की झलक दिखाकर यह अपनी व्याप्ति का संक्रेत कर रही.है

आज की कविता अपना मघुर संग्रीत-छुना रही-हे,:जो;खुनना ज्वाहें जे .सुन सकते हैं॥ .प्राठक -या श्रोता -को -इसकी >अनेक- ऋपता आर :रसणीयता के ,छद्॒यंग्सःकरने,सें जो कठिनाई पड़ती

धआ्राधुनिक काव्यधारा

है उसका कारण स्पष्ट है, बस्तुतः इसका रूप-रंग पृववर्ती कविता से भिन्न है। इसी से केवल विशिष्ट प्रकार की कविता का श्रभ्यासी ऋोर केवल उसी को कविता माननेवाला सामान्य पाठक नूतन ऋर परिवर्तित काव्य, को अनर्गल प्रलाप मात्र समझता है

जीवन की परिवर्तित परिस्थिति का सम्यक्‌ महत्त्व सममने के कारण ही आधुनिक काव्य के रसास्वादन में कठिनता हो रही है। उल्नीसवी ओर-बीसर्वी -शत्ती ने वस्तुस्थिति और मनोद॒ष्टि सें महत्त्वगण परिवर्तन उपस्थित कर दिया है। इसी से जीवन ओर जगत्‌ की परिस्थिति को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करनेवाली नवीन कविता भी बदली हुई दिखाई देती है। राजनीतिक, सामाजिक और आशिक आदर्शो' में विश्वव्यापी उलट-फेर हो रहा है। आज की कविता विगत कल के प्रचलित विचारों, मनोभावों ओर परंपरा से छूटकर दूसरी ओर बढ़ रही है

स्वच्छुंदता ओर परिवतेन के उपस्थित होने पर भी काव्य- धारा अप्रतिहत गति से ही प्रवाहित होती रहती है उसके सनोभावों और विचारों सें पारंपर्य और क्रमिक विकास बराबर बना रहता है। इसी पारंपये और अखंडता के कारण साहित्य के दो विभिन्न चुग आऋखला की कड़ियों की भाँति परस्पर जुड़े रहते हैं, यद्यपि दो युगो के बीच संक्रांतिकाल का होना अनिवार्य है। इस संक्रांतिकाल में परवर्ती युग की प्रवृत्तियाँ पूँववर्ती युग की प्रवृत्तियों को अपदस्थ कर स्वयं पदारूढ़ होने की चेष्टा करने लगती हैं। इसीलिये इसके अनुशीलन से आनेवालै युग के महत्त्व, उसकी विविध ग्रवृत्तियों के हेतु ओर प्रभाव के अध्ययन में विशेष सहायता मिलती है छा

ऐसे ही महत्त्वशाली संक्रांतिकाल के दशेन हिंदी का भारतेंदु- “जग करांता है, जब आधुनिक काव्य रीतिकाल की भावना ओर

जब

उपक्रस 2 सनोरृष्टि की पुरानी पद्धति त्याग कंर नूतन पथ को ग्रहण करते की चेष्टा कर रहा थां। आधुनिक काव्य का आरंभ ऐसे ही त्याग और ग्रहण से हुआ ओर भारतेंदु-युग आधुनिकता के प्रथम प्रयास के रूप में दिखाई पड़ा नूतनता-विधायक इस प्रथम युग का नाम “भारतेंदु-युग” अनुपयुक्त होगा, क्‍योंकि सभी हिन्दी- अमी जानते हैं कि भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र और उन्हीं के रंग में रंगे हुए उनके सहयोगियों के सतत परिश्रम से ही इस युग का प्रवर्तेत संभव हो सका इसी कारंण प्रस्तुत पुस्तक के प्रथम खंड का नामकरण 'भारतेंदु-युग” किया गया है। भारतेंद-युग इसाइ संबत्‌ १८६४ से १९७०० तक माना जा सकता है - भारतेंदु-युग की गति विधि ओर गतपूर्ब युग के साथ उसके संबंध के सम्यक अध्ययन के लिये रीतिकाल कां आलोचतात्मक परिंचय देना आवश्यक है ओर: वर्तेमान काव्य के स्वरूप-बोध के लिए भांरतेंदु- युग का पर्यालीचन अपेक्षित हे, क्योंकि स्वतन्त्रतापूवक पुरानेपन का त्याग और नएपन का ग्रहण तथा दोनों के सम्नन्बय के लिए सांसंजस्य-बुद्धि का उदय इसी समय से हुआ | पर यह सामंजस्य केवल विचार के क्षेत्र में लक्षित.हुआ, . भाशतेंदु-मंडल ने परंपरा से प्राप्त भाषा ओर प्रक्रिया को ज्यों का त्यों बताए रखा

भाषा के क्षेत्र में परिवर्तेत उपस्थित होने पर आधुनिक काव्य के दूंसरे युग का आरंभ हुआ | इस युग में गद्य की भाषा खड़ी चोली ब्रजञभाषा को अपदस्थ कर पद्म था काव्य की भाषा बनी | यद्यपि खड़ी बोली को पय्य की भाषा बनाने का आंदोलन भारतेंदु- थरुग के अंतिम वर्षों में ही खड़ा हो गया था तथापि इस क्षेत्रे में इसका सर्वसंमति से ग्रहण इसी समय हुआ | पद्म के क्षेत्र में खड़ी 'बोली के परिष्कार का वास्तविक उद्योग स्वर्गीय पं० महावीरप्रसाद 'द्विबेदी के तत्त्वावंधान में ही हुआ। उन्होंने लेखकों को गय्य-

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2, आधुत्तिक काव्यधारा

रचना करना ही नहीं सिखलाया प्रत्युत आज के कई खड़ी बोली के प्रसिद्ध कवियों-को सरस्वती” के सम्पादक क्रे नाते उसमें काव्य-- रचना करना ,>भी सिखलाया। इस ग्रकार हरिश्चन्द्र के समान" ड्िवेदीजी का भी साहित्य की गति पर व्यापक प्रभाव पढ़ा 'उनके अथकछ पंरिश्रम से ही आज खड़ी बोली फल-फूल रही हे इसका अधिकोंश अ्रेय उन्हीं को है। टिबेदीजी के इसी व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखकर प्रस्तुत पुस्तक के ह्वितीय सड का नाम “द्विेदी-युग, रखा गया है। इसका आरम्भ इंसाई संबत्‌ ९५००- तसे मांगा जा सकता है।

नवीनता के उपयुक्त दो युग हमें आश्ुनिक क्राव्य के विचार तथा भाषा संबंधी परिवर्तनों से परिचित कराते है. और वर्तमान कब्रिता हमारे समच्ष उपस्थित करते हैं, जिसकी विविधता और अंनेकरूपता का उल्लेख पहल्ले किया जा चुका है। ये दी युग नवीन कविता के विचार तथा भाषा संबंधी विकास के दो ससोपान हैं। इन दो युगो का <ंग चढ़ने के बाद ही वर्तमान काव्य का प्रा-पुरा चित्र श्रस्तुत हो सका | अतः आज की कविता का स्वरूप सममंने के लिये “भारतेंद-युग” तथा 'हिवेदी-युग! की विशेषताओ से परिचित होना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान काव्य की विधिध तथा -विरोधी अवृत्तियों और प्रक्रिया के, निधोरण एवं निर्माण में इन्होंने ही:विशेष योग दिया है इन दी युगों के सम्पक अध्ययरन्न से इसको पता लंग जाता है कि आधुनिक प्रवत्तियों का उदय - अकारण या अनायास नहीं हुआ है, अत्युत इनके क्रंमिक विकास:

- उपक्रस प्रा

का पूरा इतिहास -है इस इतिहास क़ा विषरण देने के अनन्तर पुस्तक के तृतीय खण्ड में. आधुनिक काव्य के वर्तमान थुग का परित्रय देने की चेष्टा की गई है। बतमान युग का आरंभ इसाई संवत्‌ १६१७-२० से माता जा सकता है, जब से कवियों का एक समुदाय विचार तथा प्रक्रिया में नवीन रमणीयता लाने में दत्त- चित्त हुआ पूरी काव्यधारा को अभावित करनेवलि किसी व्या- पक तथा प्रभावशाली, कतो के अभाव मैं इस,काल को “वर्तमान युग” कहना ही उचित होगा

वतमान युग के महत्त्व तथा आधुनिक क्राध्य की आधुनिकता का सम्यक्‌ बोध इन्हें साहित्य के इतिहास का अंग ओर अंश मानने पर ही हो सकता है। इतिहास की विशद भूमिका के बीच स्थित करके देखने पर आधुनिक काक््य के थे युग विरोध का रूप-रंग त्यागे हुए पूर्ववर्ती काल से संलग्न परवर्ती युगों के रूप में ओत-प्रोत होकर श्खला की कड़ियों की भाँति परस्पर नथे हुए दिखाई देते है। ऐसी व्यापक दृष्टि से देखने पर आधुनिक काव्य के ये साठ वर्ष हिदी-साहित्य के इदठिहास में नवीन उत्थान अनु- प्राशित करते दिखाई देते हैं। अतः भक्तिकाल और रीतिकाल की भाँति आधुनिक काव्य के इन साठ वर्षा' को “नवीनकाल” कहा जा सकंता है। जीवन ओर काव्य के अन्योन्याश्रित संबंध को जानते-बूमते आधुनिक काव्य के अध्ययन का महत्व प्रतिपादित करने की कदाचित्‌ ही कोई आवश्यकता प्रतीत हो। भारतीय . , इतिहास ओर जीघन में उन्नीसववी ओर बीसवीं शती का अत्यधिक

है आधुनिक काव्यधारा

महत्त्व है। जीवन के सभी क्षेत्नों--सामाजिक, राजनीतिक ओर आर्थिक आदि--में इनका प्रभाव लक्षित होता है इन दो शतियों ने कबियों की मनोरृष्टि में भी अभूतपूर्व परिवर्तेत डपरिथित करे दिया है | कवि वर्तमान जीवन की जटिलताओं ओर समस्याओं द्वारा वाणी केश गार के उपकरण जुटा रहे हैं। आधुनिक काव्य 'के तीनों युगों से से प्रत्येक अपने समय का दर्पण है। इस प्रकार “इन युगों का सहत्त्त जीवन ओर साहित्य के अध्येताओं के लिये ओर भी बढ़ जाता है। आज की वस्तुस्थिति के सच्चे रबरूंप को "समझने के लिये आधुनिक: काव्य के अनुशीलन की अत्यन्त आवश्यकता है।

ञ्ग्न्नैँ

रीतिकालीन काव्यधारा

विक्रम की सन्नहवीं शतती के अंतिम चंरण से हिंदी-काव्यधारा नवीन दिशा में प्रवाहित होने लगी काव्यगत इस परिवतेन के साथ-साथ देशदशा में- भी परिवर्तन लक्षित हुआ विदेशी आक्रमणों का अन्त हो गया ओर मुगल बादशाहों के आधिपत्य में व्यवस्थित शासन का प्रारंभ हुआ | देश में शांति ओर सम्रद्धि का आविभाव होने लगा, फल्नतः प्रजा अपने तन-धन को सुरक्षित सममने लगी |

शांतियुक्त ओर व्यवस्थासंपन्न परिस्थिति से प्रवाहित होकर हिंदी-कविता का क्षेत्र भी परिवर्तित हो गया , तत्कालीन कबि अपने पूर्ववर्ती भक्त कवियों की भांति आमुष्मिक कामना करने से विरत होकर लोकरुचि के अनुकूल ऐहिक सुख ओर भोग- 'बविज्ञास के गीत गाने लगे देशदशा के इसी परिवतेन से काव्य अभावित हुआ ओर'नए ढंग की कविता का उद्धव हुआ |

हिंदी-साहित्य के इतिहास में यह नह काव्यधारा रीतिकालीन “कविता ( सं० १७००-१७०० वि० ) के नाम॑ से प्रसिद्ध है। यह 'नाम अत्यन्त महत्त्वपर्ण है, क्‍योंकि यह कवि ओर आलोचक के कतेव्यों की उस अस्पष्टता का भी संकेत देता हे जो इस काल की सर्व॑ंसामान्य विशिष्टता थी। इस समय खाहित्यशास्र के सिद्धांतों को पद्मबद्ध करके कतिपय उदाहरण देने की परंपरा सी घचंल पड़ी यंथारथ में रचयिताओं का ध्येय साहित्यशात्व का सम्यक्‌ निरूपण होकर काव्यनिर्माण की शक्ति का 'प्रदर्शन मात्र था “इसी कारण बहुत से कवि आलोचक का बाना धारण किए दिखाई

दे फ्राधुनिक काव्यधारा

देते हैं। इन आलोचकाभास कबियों के प्ंथों से साहित्यशाश्र का सम्यक बोध नहीं हो सकता। रीतिकाल के कविवों में अलंकार या रस की पद्चब्द्ध व्याख्या का फ्रेशन सा चल पड़ा अधिकांश कवि ऐसा ही खिलवाड़ करने में संत्ग्न हुए। इससे इन कवियों. की तत्कालीन साहित्यिक रूढ़ि की दासता लक्षित होती है। यह रीतिकाल की सर्वसामान्य शवृत्ति है

'रीतिकाल की अधिकांश कविता धार्मिकता का बाना धारण 'किए हुए है, थद्यपि वास्तव में इसका विषय लौकिक ग्रेम ही है कविता की सबसे बड़ी कसोटी, भावानुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति: का “ही रीतिकाल की धार्मिक कंविता में पूर्ण अभाव है। केबल राधा ओर कृष्ण के नाम के समावेश के कारण इस समय की कविता को धार्सिक नहीं माना जा सकता। सच ज्वात तो यह है कि भक्त कवियों के भावातिरेक का समय समाप्तःहो चुका था, शैतिकाल के अधिकांश कवि दरबारी थे और उनका ध्येय था अपने आश्रयदाता की तुष्टि | “इन कबियों के लिए कविता लौकिक खुख का जाधन थी। अतः उसमे संसारःसे -व्रिस्त भक्त क्रतियों की सी उद्दीप्र भावना की खोज़ व्यथ है रूरखार और आश्रय-- 'दाता-को प्रसन्नता के लिए लोकिक वासनायुक्त ओम की कविताओं: 'की अत्यधिक रचना-हुईं। इससे दरबारी लोग असन्न भी हुए. आर कवियो-का मान भी-बढ़ा। इसलिए यह ज़ानकर -कोई आज्चय नहीं होता कि रीतिकाल के अधिकांश-कवि भ्रेस के क़व्ि हैं ओर अधिकांश कविता प्रेम की कविता-है, -जो थोथी वासना को ही उद्दीम्-करती है। सममदार जन्नता की कट आलोचना से बचने के लिए इन कवियों ने अपनी रचनामें 'राघा' और

'कन्हाई! .क्रा नाम्न-देकर उस पर श्रार्सिकता का ंग्र भर ज्ढ़ा दिया है। इस अकार राधा और -कृष्ण-के नाम-की आड़ लेकर

+.. उपक्रम ५,

इन कवियों ने/अपनी कोरी वासना की ही अभिव्यक्ति की यदि इन कविताओं से राधा ओर कृष्ण के नाम मिकॉल दिए जौंय॑ तो इन धार्मिक कंबिंताओं ओर भौतिक प्रेम की कंविंताओं में कोई अन्तर नहीं रह जाता

रीतिकाल की कविता का प्रधान वरण्य विषय ग्रेम हे। इस काल॑ में प्रेम की केबिता की जेसीं उन्नति हुई बेसी कभी नहीं। प्रेमभावना की अत्यंत मधुर ओर सार्मिक अभिव्यंजना अवश्य हुई रीतिकाल के कंवित्तों, सवेयों; दोहों इत्यादि में प्रेम का बढांचढ़ा रूप बराबर दिखाई पड़ता है। अंतः यह समय प्रेस की मधुर अभिव्यक्ति के लिए हिंदी-साहित्य में निश्चय ही चिरस्थायी रहेगा, अंत ही इस काल.सें उस ग्रेम' पर घोर झगार का गहरा रंग चंद गया हो

रीतिकाल में “प्रेम! बासना” का पर्याय बन गया ओरे प्रेस की कविता नायक-नायिका-विषयक रचना सात्र रह गईं कवि अपने को बाह्य सोदय की मोहिनी से मुक्त कर आश्यन्तर-रमणीयता के वरणणन में प्रवृत्त करने में असमथ रहे। इस कारण इनकी.-स्थूल : हृष्टि र्मणीयता की सच्ची.परख में असफल रहीं। रीतिकाल के अधिकांश - कवियों को . इतने बड़े संसार में केवल नायिका के आहरी रूप-रंग में ही सौन्दय की कलक मिली.। कवियों ने प्रकृति के भी उन्हों-दृश्यों का कविता में समावेश किया जिनसे उनकी वास- नामय प्रेमवृत्ति के उद्दीपन..में सहायता मिल सकती थी | इसलिए शिशिर ओर ग्रीष्म का ग्रहण विरह-बेदना.की अभिव्यक्ति के ही लिए अपेक्षित हुआ | वर्षा प्रवासी को अपनी विरहिणी का. स्मरण दिलाकर घर लॉटने के लिए ग्ररित करनेवाली ही दिखाई पड़ी-। बिप्रलंभ और संभोग श्गार के. विषाद-हए् को उद्दीप करने के अतिरिक्त घट ऋतुओं का मानों कोई ओर उपयोग ही नहीं था

है

१० आधुनिक काव्यधारा

ऋतु ही नहीं; उनके लिए सारी प्रकृति तक अथ हीन थीं। भारत के पार्वत्य प्रदेश की उपत्यकाओं, निरभारिशणियों, सरिताओं, लता- बीरुधों शस्यश्यामल क्षेत्रों आदि में इन कवियों को कोई स्वच्छंद सोदर्य नहीं दिखाई देता था। कवि उत्कट ग्रेमवासना के गीत गाने में इतले व्यस्त थे कि उन्हें अपने चारों ओर आंख उठाकर देखने तक का अवकाश नहीं था। रीतिकाल के प्रेमकाब्य में यहाँ से वहां तक दरबारी उच्छ खंलता ओर भोग-विलास की यही ओछी चासना प्रतिबिबित है। देश की राजनीतिक शांति ओर समृद्धि की पूरी-प्री मत्क इस कविता में विद्यमान है।

पर्वोक्त विज्ञास की सामग्री के भार से दबकर काब्य की दृष्टि संकुचित हो गई आओर उससें व्यापकता सकी। कबियों को श्चना के लिए नए-नए विपय मिल सके इसी से प्रेम के अतिरिक्त अन्य विषयों पर बहुत कम कवियों ने काव्य-रचना करने का उत्साह दिखलाया | फल्ञस्वरूप इस काल की कविता में विविधंगा तथा अनेकरूपता के दर्शन दलेभ हो गए ओर उसमें कवियों की व्यक्तिगत विशेषता की छाप पूरी-एरी पड़ ही नहीं सकी | फर इन रचनाओं सें ' विशिष्ट शैलियों का विकास होता तो केसे होता कवि केवल परंपरा के निवोह में उन्नक गए, उससे छूटकर स्पनी-अपनी प्रथक शैत्ञी के विकास की चेष्टा कोई करता भी तो केसे करता। परिणाम यह हुआ कि नाम हटाकर यदि इन कवियों की रचनाएं भित्ना दी जायें तो इनकी रचनाओं को रचयिताओं की विशेषता के आधार पर छॉटना अत्यन्त कठिन हो जाय इस . काल के कंबियों ने भक्तिकाल से: मिली छंंदों तथा भाषा की जमी- जमाई पद्धति को पाकर ही पूर्ण संतोष-लाभ क्र लिया नए-नए छंदों का विधान करने की नतो उनमें उमंग ही उठी ओऔर

भाषा-शेली में अपना-अपंना रंग ज्ञान के लिए उनकी वाणी का काश ही खुला

उपक्रम १९:

यह सभी जानते हैं कि साहित्य के रूढ़िग्रस्त हो जाने-पर ही परंपरा के विरुद्ध प्रतिवर्तेन अथवा परिवर्तन का आरंभ होता है आधुनिक काल में यही घटना घटित हुईं। रीतिकाल में प्रेम की कविता अपनी चरम सीमा पर जा पहुंची पर इसमें जीवन के. प्रति उदार दृष्टि सकी, जिससे धीरे-धीरे इसकी संजीवनी- शक्ति का नाश हो -गया। क्या भाषा, क्या भाव ओर क्या वृत्त. सभी कुछ रूढ़ि से जकड़ गया, संजीवनी शक्ति टिकी भी रहती - तो किस आधार पर.।.. - -

रूढ़ि ने कवियों की .सर्व तोमुखी भावना कुठित कर दी | प्रकृति का तो बहिष्कार सा हो गया कवि अपने चतुर्दिक नित्य- ग्रति घटित होनेवाली घटनाओं से भी आहकृष्ट हो सके !: इस काल में लोकगत साधाश्ण चेतना भी लुप्तप्राय हो गई थी ओर जनता- कूपमंडूक बन बेठी थी कवि अपने काव्य की नायक” नायिक्राओं की ग्रेमक्रीडा ओर पिरह-बेदना के वर्शन में ही व्यस्त थे। बे न॑ तो जीवन के अन्य अंगों पर दृष्टिपात ही कर सके ओर सामयिक घटनाओं ओर विचारों का अपनी रचनाओं में समा-“- वेश , ही।, इसी लिए रीतिकाल्न:की अधिकांश कविता में साम-- यिकता का पूर्ण अभाव है | रीतिकाल की रचना से सामान्य रूपमें यह आंति हो सकती है कि इस काल में निरवच्छिन्न;शांति विराज- सान्‌ थी, कितु इस काल की तीन शतियों तक अटहूट शान्ति थी नहीं। बीच-बीच में राजनीतिक षड़यन्न्न, विद्रोह ओर उत्पात होते ही रहते थे, यद्यपि कविगण तो उनसे अभावित हुए और उनका महत्त्व ही समझ सके। .इस,अकार रीतिकाल के कवियों: "का देश के सामान्य जीवन से कोई संपक नहीं रह गया। इस काल की कविता में. ऐतिहासिकता के अभाव का प्रधान कारण यही है)

३३ आधुनिक काव्यधारा

कहा जा सकता है कि उकयु क् पंक्तियों में रीतिकाल के अवगुणों पर-ही दृष्टि रखी- गड्ढे है, पर सच पूछिए: तो यह उस काल की असाधारण वास्तविक काज्यस्थिति का साधारण चित्र . मात्र हैं| वस्तुतः यहाँ रीतिकालीन काव्य कीं सामान्य प्रवृत्तियों की गति-विधि ओर विकास के दिग्दर्शन की ही चेष्टा की गई है। इससें कोई संदेह लहीं कि इस कालमें लक्षित होनेवाली कतिपय इन अवांछनीय प्रवृत्तियों के साथ-साथ इस काल की कविता में यत्र-तत्र रमंणीयता के भी खुले दर्शन हंते है। परंपरा-पालन आर रूढ़ि-निवाह वाले इस काल में भी बिहारी की कविता में रचना-कीशल, अथ-गोरव तथा मॉलिकता पयोंप्त परिमाण में

मिलंती है। घंनानंद की क॒ति में अंत त्ति की गृढ एवं मार्मिक अभिव्यंजला उपलब्ध-होती हैः। उसे विलासपरणो परिस्थिति में भी मूंघण की रचनाओं में इतिहास ने काव्य का बाना घारण कर लिया है ओर इस प्रकार उनकी कविता में वास्तविकता और काव्य एक-दूसरे से जुड़ गए है। फिर भी इन्हें उस काल की साधारण अवृत्ति से प्रथक और अपवाद-स्वरूप ही मानना पड़ेगा। इसी प्रकार के कुछ अन्य प्रसुख कवियों को छोड़कर इस कांलकी कविता मे उदात्त भावना के बहुत कम दर्शन होते हैं. प्रेम का वासनांपर्ण रूप ही अधिक दिखाई देता है और उसमें भी घोर ज्ृगारिकतां का पुंट है। संदिये-चित्नण में संयम का पर्ण अभाव है ओर कवि कभी-कभी उच्छु खंलता की सीमा तक पहुंच जाते हैं अक्ृति- सीदर्य के लिए तो अधिकांश कवियों के पास आँखें ही नहीं हैं|

फिर भी यह समक लैना चाहिए कि काव्य की ऐसी स्थि का संपू् उत्तरदायित्व,कैवल इन कवियों पर ही है ओर इसका सारा दोप इन्हीं के सिर पर मढ़ा जाना चाहिए। उस समय की प्रिस्थिति- तथा भावना काव्य-के- उद्धत्त आदर्शों' की आपि-के-:

उपक्रम श्रे

अतिकूल थी यह मुगल बादशाहों का शासन-काल था ओर 'उनके भोग-विल्लास की कहानियाँ चारों ओर ग्रचलित हो गई थीं। उनके <च्लछखल विलास का अनुकरण अन्य छोटे-छोटे राजा भी कर रहे थे, अतः उस समय की आगारी कविता में विलासपूर्ण जीवन का चित्र स्वाभाविक हे क्योंकि अधिकांश कवि किसी किसी दरबार के आश्रित थे। इन कर्वियों का व्यक्तित्व इतना दृढ़ नहीं था कि ये तत्कालीन प्रचलित साहित्यिक परंपरा आर प्रवृत्ति-से ऊँचे उठ सकते ओर काव्यधायरा को सोड़कर सद्‌- वृत्तियों का उद्धार ओर उत्थान कर सकते काव्य की ऐसी स्थिति अधिक समय तक टिक नहीं सकती थी | समय में परिवतेन होने लगा सन्‌ सत्तावन के विद्रोह ने जागरण के युग का आभास दिया। समग्र भारतवर्ष भें नवजीवन का संचार हो गया, देशमें समाज-सुधार की लहर फेलने लगी अंग- रैजी शासन तथा शिक्षा के प्रसार से भारत का रूप-रंग बदलने लगा नवजागर्तिके दर्शन होने लगे ऐसी दशामें हिदी-साहित्य £ इनके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता था ! अतः हिदी-साहित्य 'की आधुनिक जागति अत्यंत स्वाभाविक थी। फलतः काव्यक्षेत्र में रीतिकालीन प्रचीन काव्यधारा का अवाह रुक गया ओर नवीन काव्यधारा नए मार्ग पर स्वच्छुंद गति से ग्रवाहित होने लगी। हिंदी की नए ढंग की आधुनिक कविता इसी परिवर्तित त्वाह का

परिणाम है इस प्रकार साहित्यिक तथा राजनीतिक इतिहास का फिर से

संघटन होने लगा ओर दोनो काव्य तथा जीवन के अन्योन्याश्रित संबंध की पुष्टि करने लगे आधुनिक ससय की सामाजिक तथा राजनीतिक जागर्ति के बीच काव्य के नवीन दिशा की ओर मुड़ने के कारण इस नूतन काब्यधारा को आधुनिक काब्यधारा” कहना अनुपयुक्त होगा

ब््‌

१७ आधुनिक काव्यधारा

काव्यक्षेत्र के इस सव॒-प्रभात के सर्वप्रथम चेतालिक भारतेंदु चाबू हरिश्चंद्र थे। हिंदी-साहित्य के क्षेत्र में पर्चीस वर्षों -तक उनका अत्यंत व्यापक अभाव पड़ता रहा ओर जाने' कितने कवियोंने उनसे स्फूर्ति तथा उत्साह प्राप्त किया इसलिए नई रंगत की आधुनिक कविता के प्रथम उत्थान का शीषक भारतेंढु- युग” रखा गया है

आधुनिक कविता की गति-विधि तथा विकास के सम्यक्‌ बोध

के लिए भारतेंदु-युग की प्रवृत्तियो का विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है। -

प्रथम खेंड--

प्यर छउल्यकान भारतेंदु-युग ( विचार में परिवर्तन )

भारतेंदु-युग

समय-चक्र की गति के साथ साहित्य में भी परिवर्तन अवश्ये- भावी है। इसलिए सन्‌ सत्तावन की नवज़ागति से निश्चित ' हो गया कि रीतिकालीन काव्य का आदर्श नवयुग में गृहीत हो सकेगा रीतिकाल की कविता का प्राचीन आदर्श नवग्रवतित समय के अनुकूल नहीं था। सोॉदर्यपूर्ण होते हुए भी रीतिकाल की ऐकांतिक श्ूगारी कविता नूतन-युग की नवृजागरित भावनाओं केश सेल में होने के कारण धीरे-घीरे प्रभावहीन हो रही थी नवयुग के प्रतिनिधित्व के लिए काव्य में किसी ऐसे नवीन आदश की आवश्यकता थी जो नवीन चेतना से अनुप्नाशित ओर उन्नति की आकांक्षिणी जनता की आशा-निराशा, भय-उत्साह तथा उसकी हृद्गत इतर भावनाओं की पूर्ण रीति से अभिव्यंजना कर सकता | काथ्य के इस नवीन आदश का वास्तविकता से समनन्वित - और स्फूर्तिदायक होना भी आवश्यक था। भारतेदु-युग कान्य के इस आदर्श की अतिष्ठा में पूणंतया सफल हुआ भारतेंदु-युग के इस नवीन आदर्श से काव्यरूद़ि एवं परंपरा का क्रमशः त्याग अनिवाय था इस आदशे की सब से बड़ी विशे- घता थी भावानुभूति की सचाई। रीतिकाल में सामान्य जनता से कंवियों का संपर्क छूट गया था। फल॑तः इनकी कविता में जनता के साथों की भमलक बहुत कम है। अपने आश्रयदाताओं के परितोष के लिए श्रृगारी रचना में प्रवृत्त रीतिकालीन कवि साम- यिकता तथा वास्तविकता से बहुत दूर जा पड़े थे इसके विपरीत

७]

श्प आधुनिक काव्यधारा

भारतेंदु-युग का नवीन आदशे यथार्थवादी तो था ही, सर्वोगीण भी दिखाई पड़ा इसने संपूर्ण जीवन को अपनाया था यह देश की दुरवस्था से पूरी तया परिचित था यह आदशे आश्रयदाताओं की चाटुकारिता को छोड़कर कवियों में आत्मसंमान की भावना भरने लगा इस नवीन आदशे ने भारत की म॒ुक तथा पीड़ित॑ जनता की हृद्गतभावना की पूर्ण अभिव्यक्ति की ।विषम परिस्थिति से आंख म्‌दकर इस आदर्श ने कवि तथा देशवासियों के विचारों को भत्ी भांति प्रत्यक्ष किया राजनीतिक शब्दावली में कहा जा सकता है कि रीतिकालीन काव्य का आदशे एकनिष्ठ सत्ता(8०८००००००) की ओर अभिमुख था तो सारतेंदु-युग का आदर्श लोकनिष्ठ सत्ता की ओर उन्मुख दोनों समय के इतिहास से भी इस कथन की पुष्टि होती है। रीति- काल के कवि अपने आश्रयदाताओं के अधीन थे उनका ध्येय था राजाओं की प्रशस्ति का पाठ तथा साध्य था उनका परितोष इन कवियों के लिए जनसत्ता या लोकसत्ता महत्वहीन थी वे जनता को भावधारा में अवगाहन करने को उमंग नहीं दिखाते थे। उन्हें इसको चिता तक नहीं थी पर अब समय परियर्तित हो रहा था, सन्‌ सत्तावन के उपद्रव से बहुत से रजवाड़े लुप्त हो गए थे और अनेक देशी रजवाड़ों की शक्ति क्षीण हो गई थी कबियों के आश्रयदाता भी नहीं रह गए थे इस विज्तव ने जद" कवियों से दिल्ली छुड़ाईं। उन्हें अन्य आश्रयदाताओं की खोज के लिए विवश किया ओर हिंदी के कवियों को स्वावलंबन का अवसर प्रदान किया। ये कवि अब छोटे-मोंटे आश्रयदाताओं की कृपा पर अबलंबित नहीं रह सकते थे। इसलिए जहाँ रीतिकाल के कवि.अपने लोकिक पालकों को असन्न करके पुरस्कार पाने के लिए. लालायित रहते थे वहाँ इस उत्थान से कवियों और लेखकों को.

भारतेंदु-युग १&

केवल जनता से ही प्रशंसा की आशा थी। इस परिवतंन का एक कारण छापेखाने का चलन भी (है, क्‍योंकि इससे जनता से सान्निध्य बढ़ाने के लिए लेखकों को सरलभाध्यम मिल गया। इन नवीन लैखकों एवं कवियो'को यह भली भाँति ज्ञात था कि जनता में ्ञीकप्रिय होने पर ही हमारी ऋतियों की सफलता निर्भर हे थोड़े में यों कहिए कि कवियों का उत्तरदायित्व अब जनता के प्रति था। इस प्रजातंत्रात्मकर विचार ने कवियों को अपने चारों ओर की परिस्थिति का पूरा-पुरा बोध कराया। इस उदार यथार्थबादिता ने कवियों की घनिष्ठता जीवन के सभी अंगों से बढ़ा दी। इस अकार भावानुभूति और सचाइईको काव्य में फिर उपयुक्त स्थान प्राप्त हुआ भारतेंदु-युग का यह परिवर्तन बहुत ही महत्त्वपूर्ण हे ऐसा समम लैना चाहिए कि काव्य का यह प्रजातं॑त्रात्मक आदश केवल राजनीतिक ( विचारों के ) परिवतेन का परिणाम था। यह देशवासियों की नवजागरित चेतना का विशद और ग्रकाश्य रूप था इस समय समग्र देश में जागति की लहर फेल रही थी। जनता के सामने नवीन धार्मिक तथा सामाजिक़ समस्याएं खड़ी हो गई थीं | आयेसमाज का आंदोलन हिडुओं की सामाजिक 'तथा धार्मिक कुप्रथाओ का तीत्र रूप से प्रतिबाद कर रहा था नवीन सामाजिक भावनाओं से प्रभावित पढ़े-लिखे लोगों भे इस आंदोलन छा स्वागत हो रहा था। ऐसी परिस्थिति ने धीरे-धीरे राजनीतिक मनोदृष्टि में भी परिवर्तन उपथित किया भारतीय इतिहास की यह अत्यंत आश्चयंपूर्ण घटना है कि राजनीतिक परिवतेन सदा घामिक तथा सामाजिक आंदोलनों का आनुगामी रहा है। जेसी घटना मरहठा संघ के स्थापित होने के पहले घटी वेसी ही उन्नीसर्दी श॒ती के उत्तराध मैं भी। हिुओं के सामाजिक एवं धार्मिक पुनरुत्थान से ही भारत के आधुनिक राष्ट्रीय

२० आधुनिक काव्यधारा

आंदोलन का प्रादभीव हआ है #। इस प्रकार इस समय के सामाजिक आंदोलन जनता की राजनीतिक चेतना के अम्रदत थे सधार और व्यवस्था की भावता एक बार जागरित होते ही अपने आप जीवन के सभी पक्षों पर छा गढ़ सामाजिक अभाव तथा दरवस्था की चेतना ने आधथिक कठिना३ई को आर वरबस ध्यान आकृष्र किया तो आश्रिक परवशता ने विदेशी शासन की आर संकेत किया

यह भारतीय इतिहास में नवजागति का समय था | देश को भावना तथा विचारों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। साहित्य सें इनकी झलक मिलना अत्यंत स्वाभाविक था। साहित्य अब केवल खूगार के गीतों से संतुष्ट नहीं रह सकता था। उदार राजनीतिक तथा सामाजिक विचारों से अभिनव काव्य का निर्माण हुआ आर इसमें नवयुग परणेतया प्रतिजिंबित हुआ |

हिदी-काठ्य ( तथा साहित्य ) के पुनरुत्थान का सारा श्रेय _ आभारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र कोहै। इनके तथा इनके सहयोगियों के

प्रभाव से कविता जनता की वाणी बनी इन लोगों के द्वारा सब से

महत्वपूर्ण काये यह हुआ कि जीवन ओर साहित्य का जो संबंध रीतिकाल में शिथिल पड़ गया था, फिर से घनिष्ठ हो गया भारतेंद-युग की यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है, जिसका आगामी साहित्य पर अत्यंत व्यापक प्रभाव पड़ा भारतेंदु-युग की कविता

# सर वैलेटाइन सिरोल का मत--- 49507 'सशातप ए€शांपवों! ज़38 007॥ 508 १०४४०॥93 0ए०७४८०६ ४7066४४ [00]9.7! 77009 40% #/८ 74०82 707" #५४८८०॥४, --- ४776 8659॥7.

भारतेंदु-युग २१:

में देशवासियों की समस्या, उन्तके विचार तथा उनकी भावना की पूर्ण अभिव्यक्ति हुईं | कवि प्रेम के गीतों की रचना के साथ-साथ जनता की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक मनोहृष्टि एवं परिस्थिति की कल्षक दिखाने लगे

शिक्षाग्नसार ओर सामाजिक आंदोलनों से यद्यपि जनता की चेतना जागरित हो गई थी तथापि भारतेंदु के आगमन से पूर्व साहित्य रीतिकाल की परंपरा का ही अनुसरण कर रहा था; साहित्य-क्षेत्र में तबतक रीतिकाल के ऐकांतिक आदर्श की ही प्रतिष्ठा थी | शिक्षा ने तो देशवासियों के विचारों को उदारता का वरदान दे दिया था, पर साहित्य अभी रुढ़िग्रस्त ही था। इसका हेतुस्पष्ट है | बस्तुत: शिक्षित जनता अपने को हीन समझने लगी थी। पाश्चात्य सभ्यता की चकाचोंध से इसे अपने साहित्य में नाममात्र की भी उत्तमता नहीं दिखाई देती थी | राजभाषा के रूप में प्रच- लित उद्‌ भाषा ने भी शिक्षित जनता ओर हिंदी साहित्य के बीच लंबी-चौड़ी खाई बना रखी थी इस समय ऐसे प्रतिभाशाली ओर इृढ़ व्यक्ति की आवश्यकता थी जो साहित्य में नवजीवन का संचार कर सकता। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र में ऐसी ही प्रतिभा के दर्शनहुए अपनी