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शवक अनंत वाषण धा) शीरपछतौ एणा, ९९६, गिणीष-व,

्रकरक-त्रनव्म इसिसादनी, काठ रोऽ-एकादी बदर न,

प्रस्तावना

वेदातविषे यह 'योगवापिष्ट भय बहुत परसिद् दै. यह भय मूक ते दै. तिके कत्तं वासमीकि ऋषि है तिसप्र कोह षिः दूने दीका करी है. यह गथ बहत प्राचीन है. इरी भाषा कोहं परमाथी साघु पुरुषने करी हैः तिनका नाम ज्ञात नहीं ह, फसा सुना है फि-योगगापिष्ठकी कोह महासा पुरूष कदी कथा करते थे, तहां इत माषके कृरमेषहे साध्व थवणफे बस्ते प्रतिदिन जाते थे. जब श्रवण करे, आश्रमपर आते थे तब जैसा सुनते ये, वैसारी व्याल्यानसहित छिखते जते ये. एसे इस योगवासिषठ अंथकी भाषा तिन साच पुरषने संपूण करी, इस रीतिसे य्ह ग्रथ भया है, इसीपे इसकी भाष अतिघुगम मर है, ओर पह साधु पुरुष अनुभवी थे इससे कदींभी सिद्धातविरुदध वाक्य इसर्म नदीं दीस पडते. भाषा पढनेवाठे पुुश्चुजरनोपर तिन कृप साघु पुरुषका गडा

उपकार भया दै. स॒ब पिरि, इस थे षट्‌ (६) प्रकरण दै, सो सब ञे परेतु तिनकी बही कीमत हेरे सवकरो उपयोगी नदी दै इससे युभु्जनोको आरंभे दो रकरण अतिउपयोगी पते षि- चारके, यै दोनों प्रकरण यड अक्षरों यहपप्र दमने चाय दे कि, इनी कीमत रश होनेसे सबको इसका उपयोग सहजम शोवेगा.

इन दोनों प्रकरणेमिंही इतना वेदातिरदरात द्खियादै षि जो कोई शाख्रीतिसे इतना श्रवण, मनन ओर निदिष्यासन कर, तो तिते अवश्यमेव मोक्षकी भाषि दोषे वैराग्यरकरणमें इस जग- तकी असलता देष स्ट दिखाई ह, कि, जिसके आअवणात्रते

सूचना

रूम वेदन्त्ाङणगी मशको विदित दवे कियद योगवासिष्ठ घ्र अदत उत्तम हे. इमे छट प्रकरण ह. सो सत्र छपे तेन उनकी कमित ज्यादा होने को धनायद ठेते ये परं सब नशं ठेते धे, यह देल, करक हमरे सइयोगिपरौने इषे ष्ठ तया वेप्य ये दो अकए्ण छे; कणेज्ञि, यद दोनों प्रकरण -सग्को अन्युपथोगी है आर कीमवभी कमी रक्ती हे; पठ उनके निक्षट उत्तम सशो दोनेते इन परङप्मोप देषा गोलमाक हो गया कि कथा तो उतनीकी उत. नी रदी. लेकिन्‌ वेराग्यप्रकरणमे संस्ठत श्रये ३३ सर्म ये तिलके २८ रहपये, चीर सुसुश्चुपकरणमें २० स्गके १९ रहगये. ओर इसके प्रारेभे एक ऋषीका नाम फारग्य था उसक्षा कारण होगया, सैर जो अभरिवेरथ ऋषि रोके भराहद्ध है कि, जिन्न समायणमी बनाया हे, उनङ्केभी नाममें विकार होगया. अथि छग्रिवेदयवी जगदपर कषशिवेष दोगया सौर वैराम्य्रकरण दविवीय सर्म पृष्ठ १० खष्टमीकी जगदपर अा्धिशतिमनी करदिया, परल्ह नाम तो आदी शिले. फिर नामोेमी बहा गोलमाल करदिया. यानी धृष्टिकी जगहपर कुतसाली, जय- तक्षी जगद्यर शतवद्धैन, भासकी नगदयर सुलथाम, वसिष्ठकी जमदपर नय ओर -षुकेणकी , नक्र वामदेद होगथा, छीर भगवान वृन्दाका शाप होनी कथा साफदी उडमदै, खरभी बहत विषयो अनेक विकार होगये ओर भापामी बहृतही भिगड गई, ये सुख्य विषय हमने लिखे है; सथ नी किले; क्योकि बहत विस्तार हो जधा. सो सव हमने हमारे पएस्ममनिज सुतरेरपुरनिवासी पण्डित राममद्र शमसि दध कराङे, परकारित किया. महात्मा पक्षक जन इसत हमारी प्रतिषे जब उन भा्ीन अरतिर्योको भिरवेमे, तब इसकी छद्धता माम दोजायगी. अब संपूर्णं सननोे हमारी सविनय प्रार्थना कि- यदि रिदोषसे इसमे कों अय्या रहगर्ह हो तो षमा ऋर, सुधार लै

` हरिप्रसाद भगीरथजीका पराचीन पुस्तकाय, कारकादेवीरोह, रामवाडी-धुस्बरै.

अथ योगवासिषवरिषयारुक्रमणिका।

सर्गाकाः विषयाः पकाः | सर्गकाः विषयाः पृष्राकाः वेरा्यमकरणदू २८ जगदिपर्ययवर्णनम्‌ „. „.. ८९ कथारभवरभनम्‌ „^ १, २९ सर्वातपरतिपादननणनम्र. „. ९३ कथारभनणंनम्‌ ,.. ~ <" | ३० ेय्य्योनवर्भनम्‌ . ९४ तीथैयात्ाव्णनप्र्‌ ... „~ १० | ३१ रामप््वर्णनम्‌ ... „.. ९७ दिवसव्यवहारणेनम्‌ ... १५ | २२ नमश्वरसाघुवादवणनम््‌ ... ९९ कावर = ३६ नमधरमदचरसंमेलनवर्णनप्र्‌ १०० विश्वामितागमनदणेनम्र .. १८ सरु्करण्‌। विभ्वाभितरेच्छावर्णनम्‌ = „. २० ; इकलिवावर्नम्‌ छि £ ददारथोक्तिवणेनम्‌ .., „. २९ ~ | विश्वामिवरोचवुर्णनम ... १०६ वसिष्ठखमाश्वासनवर्णनम्‌ ... रष ~ ! २३ असंरुप्ररपर्रतिपादेनम्‌ ... १०८ रमविपादवणेधम्‌ .. र्८ ; ृपाथेपकमवरणनम्‌ 4 ११ रामखमाश्वासनवर्नय्‌ .. ३९ | पृष दीन १२ रामवराप्यव्णनम्‌ ... ` .. ३९ | पुरप्थवणनम्‌ „१९३ १३ उषष्मीतिरस्कारनम्‌ ,.. ३६ | परमपृरपाथवणनम्‌ _ ~. ११६ १8 जीवितनिनठाव्नम्‌ ,, „~ ३९ ! इा्थराान्यसमर्थनवणनम्‌, ११९ ५/२५ अदैकारनिन्दावर्णन्‌ < देवनिराकरणव्णेनम्‌ ... १२९ १६ चित्तदौरासयवर्णनम्‌ „^ १२४ १७ वृप्णागारुडीवर्णनप््‌ .. ... ४९ ¦ नाननितरणवणनेम्‌ , १२७ १८ देहनैरादयवर्णनम्‌ ` , =... पृद्‌ ! ११ वसिष्टोपदेदावरणनम ... १२ १९ दाल्यावस्थानिन्दाधर्णनम्‌ ... ६० | १२ तत्व्मादातवयवर्मनम्‌ ,.. १३६ २० युवानिनदाबरेनम्‌ ... ` ... ६३ १२ रमवरणनम्‌ २१ ीनिन्दाव्नम्‌ .. ... ६८ १९ विचारवर्णनम्‌ १९६ २२ जराबस्धानिन्दावरणनम््‌ „.. ७२ १५ संतोववणेनम्‌ „. २३ कालापवाद्वथनम्‌. ... ... ४५ , १६ चाधुसंगवर्णेनम्‌ ... „शष २४ कालविकासव्ेनम्‌ .. .. ७९ | १० पद्मकप्वर्णनम्‌... =. १५७ २५ कालविलासवर्णचम्‌ .. .. ८० | १८ इष्टतवरणनप्‌ ~“ ८२ | १९ भमागवणनग्‌ 1 २७ सपेपदायोमाववणेन आगासम ““ ^ १६७ य्‌ म्‌ | २० ~ ^ णह

शयनुकमभिच्ा घ्मा्ना !

3. (४

श्रीपरमातने नमः अथ श्रीयोग्वासिषट

दैराग्यपकरणमारभः 1 1

प्रथमः सर्गः ३।

अथ कथारभवणनम्‌

सद्-चित-आनंदर्पजो आला है तिसको नमखार दै. सोक्ेषा है जिससे यह सब भासत है अर जिमगिपे यह सरव रीन होयरै मरु जिस्म ह्‌ सब स्थित है, तिस सत्य आत्मको नमस्कार दै. त्ता, ज्ञान, तेय, दरा, दशन, दशय, क्ता, कारण ओर करिया, ये जिसके तिच हेते एेषा जो क्ञानस्प आता है, तिसको नमखार है. जि निप आनंदके सुरे कणसों संपूण विश्च आनंदपार्‌ है अर जिष आनंदकरि सवं जीव जीवते दै तिस ा्तद भालाको नमस्कारै,

कोहं एक दुतीक्ष्ण अगस्तिषुनिका शिष्य होता भया; तिके मनम एक संदाय उ्यनर हृभा, तिसको निदत्त करके अथं अगस्ति युमिके आश्रमको गया. जायकृर्‌, विधितंयक्त प्रणाम करि स्थित ` भया भौर मप्रभावतो प्रर करे ठगा. पुतीण एवाच--दे मगवर्‌। घम॑तत्त्ग सवासना! ' अुश्चको एक संरायहैसो तुम छयाकरे निवत करो मोक्षका कारण कम , है रि ङ्ञानै 9 दोनों हैएयाते जो मोक्षा कार्ण होय सो कोः

(<) योगब [प्रयः सगे

अगत्िस्वाच-2 ऋष कवक रन ओर मवरङ्नेभी गोष नही हो, दोनेकिफे मषी प्रा शेतीहै कम के अकरण धुव हेतारै मोष नदी हता; अर संति, केतत कति परी हेरी, भात शा. ताय नका गिशरय, शंतकरण हए विना रार सिति मीत. तते रोना गी मिदि शतीरै.कके मवगतक्रणकी धदधिेतीदै हरि हान गजता तवमेक हिदिशेतीै सेदनं पथो कके. आश्रमो पुषिन उदताहै तेते षौ सरङञान दोनोफफेमोकपिद हेता है दे ऋष्य! से अनुमा एक पुरातन इतिह रै सेत्‌

करणयनाम बहमण अविवेका एत्र था. सो गुर निकट जाय, चार पेद पहङ्कसहित अध्ययन इता मया. अध्ययन कफे धको आवत भय ओर काति रहित हेयकर इपरहा.अथत्‌ सर यु कते रि भवा तमपितनेदेषा नो यहकतिरहित दयक्‌ सित भगा ह, रा देके, इते कहत भया-

कि ससर की पहना कवौ नह सरता १अ।१ तके कते सिवतार देगा! जिह कर कते रहि हा है, मो कारण कटि १.

काषाय एवच पति ! एक संशय गुहो तत्न है षके कते रह हो रय को पदो भका दनि जष्‌ ठा ना रै तव को कला जो ५५ हरो कती ठै जे मोर यै कहा रेक, शन गोरपेगेषशेत नह जर पुत्रा

हव वाेगोह हेता है दाना

९, ] वेराग्प्करणे-क्थारभवर्णनेम्‌। (९)

विषे गुद्चको भ्या कतमय है! यह्‌ संसय है सो तुम कृषा करे नि. इतत करो; कि, प्या करेगय दै!

अगस्तिषवाच-हे सुतीक्ष्ण! एसे जव कारुण्ये पिताको कहा, तवे तिसका वन युन, अथििदय कहत भया--

पतर ! एकं कंथा युद्रते तू श्रवण कर जो पिले हहं हे. तिसको युनकर, हृदयविषे ध्रफे भगे जो तेरी इच्छा रोय सोय करना.

एक युरचि नाम अग्सरा हती, सो जेती इछ अप्पा इती, तिनके विषे उत्तम थी. सो एक सय हिमाटयफे रिखरपर वैदी थी सो विमाय पर्व॑त कैसा दै, कि, कामनाकरफे संपन जो हृदयम चिचारे सो पे. तहां देवता अर करि्नरनके गण अप्राजोके साथ क्रीडा करते द. ओर कैसा है, जहां गंगाजीका प्रवाह छहूरी देत, चला आवत है. सो गंगा केषी दै, महापात्र जल है भिनक्रा, ^ रसे िखरपर पुरुषि अप्रा बेटी थी, तिपने हका दूत अंतरिभते चला आवत देखा. जब निकट आया, ठव अप्पराने कहा--अो सौमाग्य देवदूत ! त्‌ देवगणमें है, तू कहते भाया ओर कहा ` जायगा, सो कूपा करके कटि दे.

देवदूत उवाच--दे षर तैन पुम है सो श्रवण कर्‌ अरिष्टनेमि एक राजिं था; बने भणने पुत्रको राज्य देकर, वैराग्य लिया. पेपर विषयो अभिलाषा त्याग करे, गंधमादन पैम जायकर भयंकर तप करने ठगा- अरु मोमा तिसके साथ मेरा एक कयं था. सो काय करके, मे जव के पास जाता ह, तिनका दृत संपूणे इतत निवदन कनेको बठह _

- अष्सरोवाच-है मगव्‌ ! वर्तत कौनसादै? सो तरसे

कहो; मेरको त्‌ अतिभ्रिय दै; यह जानकर पूछती हंओर जो महा

(९) योगार . [ प्रथमः सैः

एह पिततो फे करता, तवय ते रहितरेकर उतर देते दै, ताते वैक ९९ देवद उवाच--र शे! जो शरवत दै सो एन. विस्तर के कहता एद जो राजा गंधमादन पव॑त तपकरमे ठग, सो बह्म किया, तव देवतोक राजा जो दै तन्मे सरको बुखायकर, आज्ञा की किदे दूत ! वु ग॑षमादन षतम जा ओर्‌ विमान, अप्सरा, नाना प्रकारौ सामभरी, ेषषे,यक्ष,सि- छ, बर्‌, तार, मदंग्‌-आदि बजे संग ठे जा, ओर बह गेषु मादन पव॑त कैसा है, जो नाना प्रकरी रता--ृकषोकरके पूणे है, तहं जाये राजाको विभानपर मिटये, इं यव. सदरि ! जबर दरे पेखा कहा, तष भे बिमान अर सामग्रीसहितत तदं आया अर राजते फहा 9ि-द राजस्‌ ! तेरे कारण विमान ठे आया हं ताए वैके त्‌ लगैको चर ओर देवतानके भोग भोय. जय गैन ते कहा तब भेरा यचन छुनकर, राजा बरत भया. रजोबाच्‌-दे देवदूत! प्रथम स्वगेका वृत्त त्‌ शश्चसे $, तेरे लगेभं दोप कहा ! अरं युण कहा है! तिनको नके मेँ हृदयम विचार, परे जो भेरी इच्छा देगी तो आञगा, देयद्रत उवाच राज्‌! खगम बह दिव्य भग सो स्कं पष्यसों जी पते दै, जो ये पष्ययारे हते सो रम सुख सको पत ई. म्यम पण्यविदै ष्मपुख सको पति अरे कमिशयवाञे सो इनि ुख सैको परते दँ पद तो गण होतो तोतो करै भर सकि जो देषदैसो 1 क्योकि, उनकी उ- प्त सहा नद जाती हैः अर जो कोईअपने समान पुस मोगते

१. ] वेराम्यप्रफरणे-कथारेभवणैनम्‌ (१)

द, तिनको देके, रोष उपजत है, कि-ेरे समान श्यो ॐ! अरु जो अपने नौव कृनिषटपुण्यवारे बैठ हँ पिनो देखके,आपकोः अभिमान उपजत्‌ है; किमे इनते 9 हं ओर एक ओरी दोषै, कषि-जव उपक पुष्य क्षीण होते है तब तिसी कालम उसको मृ. कृ गिराय देते हैः एक क्णभी रहन देते नही. है राजय दजो दोष कदे सो सरगम है जो तैन पंडा सो मने यण अरु दोष कह.

म,

है मद्र ¡ जवस प्रकार राजासे मेने कहा तव मोको राजनेकटा किह देवदत ! इस स्वगे योग्य हम नरी दै. अरु हमको इच्छाम नहीं ह. हम उग्र तपकरेग, तपकरके, इस देहकोभी सयग दग, जते सपं अपनी लचाको पुरातन जानिके, त्याग करता ३.ह देवदूत! ठम अपने पिमानको जहति छाये हो, तहां छेजाओ, हमारे तो नमर है. हे देवि! जब सप्रकार राजाने युश्चको कहा, तव विमान अप्सरा आदि समको क्के, स्वरम गया अर संपूण वातां मैन हे करी. तव हर परसत्न हुए अरं सुंदर बाणीकरके यद्रसे कहत भये कि-दे दत! तू बहुरि जहां राजा है तहां जा.व संसारे उराम हुआ है. उसको अब आसपदकी इच्छा हहं दै. उसको साथरेके,वारमीकी कि जि- ग्नि आस्मतलको आत्माकरि जाना है, तिनके पते जाय.मेरा संदेशा फहना कि-देमहाकरषि ! हस राजाको तत्तमोधका उपदेश करना. क्योकि, यह बोधका अधिकारी दै. हेते पि, इसको सगेकी भी इच्छा नरी अरुजरकीमी बा नरी. ताते तम हसफो तबो धका उपदेश करो जो तलबोधको पाय कर, संसारटुःखते शुक्त दोषे. हे पुमे ! जबडईस प्रकार देवराजाने मु्षसे कष्ट, तब मे चला. जहां राजा था, तहां जाई करके, मेने कहा क्ि-देराजर्‌ ! संसारस- युद्ते मोक्ष होने निमित्त गरीकिके पास चल, वात्मीफि पुचचको उपदेशा रगे, ठेसा कद, तिसको साथ ङकरः मे बासमीकिकि स्थानपर

#

<१२) योगार [ प्रथमः समैः

खय, मा मया. तिप सथानम राजाको विठया अरु ईका देश दिया. जोव तान्त भया सो युन. हम ओर राभा अव षां गये रे प्रणाम करवट, ठव बासीकिने कहा रानन्‌ ! इरार दे ! रजोवाच्‌-३ भगवन्‌ ! परमतच्् ! ओर वेदातेजाननेवा- लम र! तुम्हरे दरेन करे अव कृताथ हुभा. जव सुद्षको शरु हुभा हे जर कहु धूता हं. पा रके उत्तर कहना, जिससे संसारष॑धनते भुक्ति होय. वाल्सीङिक्षषाच- दे राजस्‌! महारामायण ओप तुते रहता सो श्रवण करके, हदयविषे तादय धारण कनेका यल कर्‌. जव हृद्पविषे तासं धारेगा, तव जीवन्धुकत होयकर पिचरेगा. हे.“ = 0 पवक्था ८. उपाय .तिसको सुनके जैसे रामचद्रनी अपने स्थतहए्‌ अर जीवनयकत होये वि है तसे तभी पिषरगा. रुजोवाच-दे भगवन्‌! रद्र कौन ये, अरु कते, अर कैपे होकर पिचरे है, सो छपा करे कटो. वाट्मीकिरवाच- देराजम्‌ शापे वदते, हरि विषय छक्र मनष्यका देहरा सो जदन्ानकर संप्र तोभी कक अत्नानको अंगीकार करे, मतुष्यका रीर धरे थे, राजोवाच दे भवर्‌! चदाद स्प जो हरि है तिसकरो शप कि कारण हभ, अर्‌ कएने दिया, सो कहो. वास्पीकि उवाच्‌ रान्‌! एक कलये सनकुमार जो निष्कम परप वेट वे मः मिलोकके पति जो विष गवयो ठो उतपुर आए,तव यासि सक्ता एके सदी हरभर एवेनि पूजन्या कियति भग भया अर सनकमारने पूजन नरह -मगवार्‌ बोलते भये हे सन्मार)

१.1 वेरागयप्रकरणे-्थारंभवणैनम्‌ (१३)

द्षको निष्कामताक्‌ा अभिमान है,ताते तू ककर अतार पाः मेगा भर खामिकातिक तेरा नाम हेवेगा. जव विष्युभगवामने दे. सा कहा, तव सनङ्मार बोटे कि-ह विष्य! सक्ताका अभिमान ुश्चकोहै.सो तेरी सवता कोहं काठ निदत्त होवेगी अर्‌ अक्ञानी होवेगा. हे राजम्‌ ! एक तो यह्‌ शाप हुमा. ओरी घन.

एक कलमे मृयुकी क्षी जाती रदी तिरे वियोगते कह ऋषि त- पायमान हए तिनको देखके विष्णुजी हसे. तव भगु बाह्णने शाप दिया कि हे विष्णु ! मेको देख तैन हसी करी है, सो मेरी नाई तूमी स्के वियोगे जवर हेवेगा.

अरु एकं ममय जाठन्थर ओर रिवजीकाथुद्ध होता थासो उषकी खी इन्दा पतिव्रता थी हृससे वह मरता नरी था. यद देख, पिष्णुजी- पे जालधरा रूप धर उसका पापतित्र्य भंग फिया, तो उसने शाय दिया क्षि-जिससे तमने भुद्चसे छल करके मेरा पातित्रत्य ध्म ण्डित फिया इससे तुम श्लीवियोग परवोगे.

तथा एक दिक देवशम बाह्मणने नरह भगार्को शाप दि याथासो सुन. एक दिन नरािह मगवाम्‌ गंगाके तीरपर गये ये, तहां देवशमो बरा्मणकी क्षी थी, तिसको देखके, नरपिंहजी भयानक रूप दिखायके हसे, तिनको देखके, ऋषिकी गाहने भय पाय्‌, शरण छोड दिये. तव देश्शमानि शाप दिया फि~तुमने मेरीश्रीका वियोग किया, ताते तुमभी सीका मरियोग पेगे.

हे राजन्‌ ! सनद्मार्‌, मयु, इन्दा अर्‌ देकामीके शाप करे विष्णुभगवाभ्लेमुष्यकरा शरीरषरा, सो राजा ददारथके षरे रगे. राजर्‌। यह जो शरीर धरा हैः अरुआगे जो इत्तंत हृआदहै, सो सावधान होय, श्रवण कर. इति श्रीयोगवापिठेवेराम्यपरकरणे कथारंभवणेनं नाम प्रथमःसयः॥१॥,

(९) योगवक्षि [ द्वितीयः सगः हितीयः र्गः २।

अथ कथाश्मवर्णनम्‌ द्‌ जो देवलोक दे अरंमूे एषीरोकं देमरं पातालसोक पेसीत्रिलेफीको प्कारातादै अर अंतर वार आसतलरि पूण ेसअमुमवातकमेर आमा तिप भाताको नम्कार दै हे रान्‌ यहशाघ रि, जिसका आरभ कषा तिसका विषय कयाद।अद रोनभ्याईे! अर सवव श्याहै भूर अधिकारी कौम टै! सो श्रवण कुर. सत्‌, चित्‌ आनंदहप, अधित, चिन्माघ् माक जानतारै सो रषये. अर पमातेद भाकरी प्रमि अरं अनास्‌अभिमान दुःखी निवि, यह्‌ प्मोन इस है भरः रहय विध्या मोष उपयक आलापएदका प्रतिपादन है सो रव दै, अर्‌ शिसकोयटनिश्रदै किं जत्रघयनासदेहका साथीहृया सोभ्सिपकारचपसा कनवाग्‌ अर एेसाजो वहति जाला है सो शं अधिकारी दै. पट राघ गोन उपाय है. परत कैषा हे मोका उपाय मि, एमानदी प्रति काना दे. जे पइ विचारे सो ्ानवा्‌ दे कहरिजत्मययुह्पतंसासमेन अवि. राजर्‌। हमहारामायण जोदैसो पतन ै.रमणगाे सवपाक नदष निनि रामकथा हैसो परयमभेने अपने भरदाज रिष्यफो ५. शिष्य श्रवण कराई है,

कयि. पएस॒चैस अर भाजने जाय राम

भरा जर हाजा यह एना. तव भसम होकर, मरदाजरे तदेषु माग, पे

२.] वेरागप्रकरणे-कृथारेमवणेनम्‌ (१५)

रसन दुभा दे राजन्‌! जब इकार नहयाजीने कदा, तन्‌ परम- उदार मिका आशय है, एसा जो भरदाज सो एहत भया कि-हे भूत- भविष्ये ईशरं ! जो परत्र हो, तो यड दर देह ङि, पपं जीव संसारटुःखते रुक्त शि अर प्रमपदको पावर्हि, सो उपाय को, ब्रह्मोवाच एत्र ! तू अपने शर सीकिके पास गमन कर बूर जो तिन्हने आलमबोधरूप महारामायण्‌ अनिदित शा- खा भरेम किया है तिनको भुनकर, जी महामोह संपारसमुदरत तरेगे. शाश्च महारामायण कैसाहै! कि, जो संपारपयुदर तरनेको पुर है अर परम फबन दै. वास्मीकिल्वाच-हे राजन्‌! श्समकार एद, परे (ह्या), मरदाजको साथ ठेकर मेरे आश्रमम आये. तवे मने भठे रकारसों इनका पूजन क्रिया. सो अह्याजी कैसे दि, जिनकी सं भूतके हितम प्रीति है सो युद्षसे कहत भये. | रहोवाचं रे एनिनमं शह गाली! यह जो रागे स- भावके कथनका आरंभ ठुमने फिया है, तिस स्वका त्याग नद करना. इसको आदिते अंतपर्यत समाप करना. यह मोक्षयायकेसा है, जो संसारख्पी सरको पार करनेके जहाज दै, करके सव जीव ताथ दोग, वल्मीक्षििकाच-े रामरा प्रकार हाजी एहसेकः दिके, अंतद्धौन हेगये, जस्त वते (चक्र एः सहूतपयत उतम, हरि खीन हो जाता दैत बाजी अंतद्ोन होगये. तव पने मरदाजते का मि-दे पतर! बऋाजीने चय कदा भरहाज उवाच भवर्‌! मको हाने पेता का पिद निग्रह! दमने रामे खमाकके सकी उम किया द,

(श) पोगवराि। [तीयः सैः

तिसा याग नही रना, अंतपर्वत समापि करना.कहिते कि, इस ससार पारफरल था जान्‌ दै इसकरि अनेक जीव्‌ छृताथे देवेगे अरं रंपारसंक्ते एकत दोेगे. पाह्मीकिर्वाच-द रार्‌! जव इसप्रकार गह्याजीने भु- फो इहा तव अ्द्याजीकी आत्गकेः अनुसार भते रथ किया अर्‌ भर. दाजको का पुत्र! बपिठ्गके उपदेराको एायफर, जिस प्रर रमी निक हो विचरे तूभी बिवर.तवउसने प्रभ क्षिया क्रि सरहाज उवाच्‌-दे मगबर्‌। जिसप्रकाररामचद्रनी जीव्‌. रष होकर विषदैः सो आदिसों कमरे ससे कह. रास्मीकिरवाच-े भरदाज! रमर, रमण, भरत, सीतकोश्या मित्र, दारय कास, अगिरोध यैर घ. समदय अरे अषटत्र ये लोग जीवन्मुक्त होय विवर, तिन

नाम युनि ९, जयेत मास २, विभीषण ४, नित ५, हते $जय ७,षेण < ये अष्टत्री हैसो निक होय्‌ ध॒ तमय हरे सदा जदैतनि हए करो कदाचित्‌ ख- रपते दवेतभावे नरी हुमा, अनामयपदि सिम क्षर 1 चिन्मात्र, र्द, परमपानतताको प्रा है `

शीयोगबासिेरागपकरेकथारे मवरननामदितीयःत्म॥ २! तृतीयः सगः २। > 99 मरगज उवाच्‌ देम्‌! सितिकषसीहे ननगुेतोमदिेभतयतसवव

३.1 वैरागयपकरणे-तीेयात्रावर्णन्‌। (१७)

वाल्मीक्ि्वाच-- एत्र ! यह जगत्‌ जो मासताहै सो बात नहीं अत्‌ मया. अगिचारके भरतादै. षार षयते निशत हो जाता दै.नेसे आकारामे नीरत मापी हैमो भरम कर है, जब विचारक देखिये तब नीठताप्रतीति दर हे जाती है तते अब्वार करके जगत्‌ भासता दै अर विषारते रीन हो जाता है. शिष्य | जबर सृषं अस्यत अभाव नदीं हता, तवर प्रमपदकी रा नदी होती. जव सयका अद्यत अमाव होय भवे, तव प्री द्ध चिदाकाश आसक्ता भगी. शेरे इय दृश्यश्च महाप्रलय कदाचित्‌ अमाव इहते है परु मँ तुषो तीन कालका अमाव कहता टं सो सत्छाश्चकर हस शसम श्रजासंयुक्त आदिते ठेकर, अंतपर्यत श्रवण कर अरु तिनको धार तव तिषकी भांति निग हेय जगे, अर अन्यात पदकी प्राति होवे. शिष्य! संसार म्रममात्र सिद्ध है; इसको प्रममात्र जानकर विस्मरण करना, सो मुक्ति दै. अर इसे बंधन स्ञरण वासना दै. जीर गरषना- करके भयकता फिरिता दै, जब वापनाका क्षय हो जाय, तव पएर- मपदकी प्राप्त हेवे.बासनमि फिरता है तिसकरा नाममनरै. जैसे सरदीकी इद जहतता पाये वपं होता है, सृके तापते गल- कर जर हेता है, तब केवल शुद्ध गह होय रहता है, ते मासरूपी जछ दै. तिसमिषे संसाकी सत्यतास्मी जता शीतलता दै.तिसः करके मनस बरक पुतला आरै. जव ज्ञानी चू्उ्य देगा, . तब संपारकी सतयतारूपी जहत, शीतठता, निशत शेनागी. जब संसारी सयत अर वासना निदत्त हई, तवभन नष हो - जता. जम मनन हुमा, तव परमकल्याण हुभा.तत दको वैष नश्न कारण वासनाहे मरु बनके कषय हेते कति. सो वासना दो प्रकारकी है एक युज अर दूसरी अदुड-सो अपने वास्तविक खरः ॥;

(१८) योगवाफ [ तृतीयः सैः

अङ्गने अनासा जोदेहादिकः, तिन अकार रना, सो जव अनातमभ भआलस-अमिमान हभ, तव नाना कारकौ वासना्थऽप्‌- जती है तिस्करके षदीयंत्रकी नाह चक ममता है.हे साधु यदजा पच मूता शरीर त्‌ देखताहैःसो गाषनास्प है. वासना दै सोही चत्र दै. जैते मरके पके आश्रयते खे होते दै ओर जवधागा टट पडा, तव पका यार न्यारा चेय पडतांदै रहता नदी ह, तसे वासनकेश्षय हृएपंवमूतोका शरीर नहीं रहता. तते सव अनथका कारण वासा. भर्‌ जो शुद्ध रसना है तिसमे नगत्का अंत ज- माब निश्रम होता ै.दरिष्य!उङगानीका जो निश्चयः सो वासनाः कर वृहि जन्मका कारण जाता है अर्‌ ज्ञानीकी वासनाहैसो वहि जन्मका रण नरी होती दै.जसे एक कचा वीज दता, दूसरा दवीज होतारै,तिसमे जो कासो बहुरि उगता है अस जो द्ध हु दै सो बहुरि नही उगता, तते अङगानीकी बासना हे, सो रसरदित है, सो जन्मका कारण है अरे ङ्ञानीकी वासना है सो रससहित्‌ ६, सो जन्मका कारण नरी. ज्ञानीकी चेश सखामाविक गण करे खडी होती ह, ओर किसी गुण्के साथ मिलकर, अपनेमे 1 करता रिषत अदतनिश्चयको धरता है.कदा- चित द्ैतभावना तिसको होती नरी. जपेखमवति पिर ताते निग अर्‌ भरू हैताकी चेषठ जन्मका कारण मह हैते इरा ऋक है,सो वरग कोर चद, तवग फिरता अर जव पैर चदावना छोड दिया, तव स्थीयमानगतिसे उतरता उतरता पिके स्वर जाता तैसे जबल अकार दती ई, तवख्ग जन्म पादता ड. जव यमं भ्कारसारत वासना , तवल्ा जन्म पाता है; जव अरंकासे वरि जन्म नरी एवता है. हे साधु ! हास रत हुभा तव पा ! चह जो अङ्नानूपी रासना

३.1 वैराग्यप्रकरणे-तीथेयात्राव्णन्‌ (१९)

तिप्तको नाश करनेका उपाय एक जहव्िया श्रे है. वरहयपिबा मोक्षरपायका शास दहै. जघ इते ओर राल्म गिरेगा तब कटर तहू अन्यकृतं पदको पवेगा, अरु ब्घविद्या आश्रय करेगा सो सुखसों आसपदको प्राप हवेगा. हे मरद्राज ! यह मोक्ष उपाय रामजी अर बरिष्नीका संवाद है सो विचारे योग्य हैः , -बोधृकठा परम कारणरै. ताते आदिमं अंतपर्यत मोक्षरपाय श्रवण कर्‌ जेते रामजी जीवन्षुक्त होय भिचरे सो एुन- एफ दिन रामजी विधा पदे, अध्ययनशाखाते अपने गृहम अये अर्‌ संपूरणं दिन विचार कनेहीम व्यतीत करदिया, बहुरि मनमें तीथे -रङकरदारका संकख धर, पिता दशरथके पास आये. पितापि मिरे जो परणं भजाको सुखम राखते थे अर सब प्रा तिसके निट रहिफे सुस पाई तिन दसरथजीका चरण श्रीरघुनाथ रहण ङ्गा, जैसे , सुंदर कमलो गहण करे तैसे पिताका चरण ग्रहण क्या. जेसे कमलके तरे कोम तरियां होती है तिन तरिरयोसित, कमल्को हंसं पकृता दै तैसे दसरथजीकी अंगुरीनको रामजीने ग्रहण किया अर्‌ बोले कि-देपिता ! मेरा भित्ततीथं अरु उकुरदारे द्दोनकृो तते तुम आशा करो, तो मे तीर्थका अर गजुरदारेका दददोन कर आ, यारा एत्र तुमको एठना करनी योग्य है ओर आपसे आगे भने कमी कहा नी; यदी प्रथैना अव करी है. तते तुम जज्ञ देहु जो मेँ जाऊं. यह चन मेराफरना नदी.कादेते कि-पसा त्रि छोकीमे कोड नही दै, जिसका मनोरथ षरते सिद हा नदी दैः सुबका मनोरथ सिद हआ रै. ताते ख्चफो कपा कर आहन दुः

वाट्मीकिस्वाच-हे मरबाज ¡इसप्रकार नव्‌ रामजीनि शटा, वसिष्टजी पास चे, तिननेभी दशरथे कटय ॐ-हे राजर्‌ 1

(२) योगब [ तीयः सैः

रामको भहा देहु,सो ती कर अर्द श्योकरि-इनका चिच्च ठग दै णोर पे राजकुमार है, इसे के साय मेना दीजे,धन दीने, त्री दीजे, बाह्मण दीजे, जिससे ये ददन करं अपि,

राज ! जवे विवार किया, तव शुभ मत देखकर, रामनीको अङ्गा दीनी". जव चने र, पिता अर माताके चरण ठगे अर्‌ सवो कंठ सगाई, रुदन करने सो तिनको भिर क्र आगे चे. अरं रष्मण अदि जे भाई दै ओर मत्री थे, तिनको साथ लेकर अरं बिष्ट आदि जे ब्रह्मण विपिके जानने वले थे, अर कुत धन, वहूतमेना यह सव साथे चे ओर दान- पष्य कर, जव गृहः वाह निकसे, तब दहि लोम ये मर शिया थी तिन सवने रमजीके उपर एर अरं फूलोकी माराोकी वा करी. सो वरषा वर वरसती है एेी दीसती थी, भर राम- जीकी जो मृति हे सो हृदयम धर रीनी. इतपक्षार रामजी व- हे षट, ता नाग अर निर्धनोको दान देते देते तीथ जो गगा यमुना, सरखदरी आदि देखे है इन विधिसुकत स्नान कर्‌, पीके चार फोन-उर, दष, पू, पश्चिमतो दान म्रा. अर्‌ चारों ओर समुर ललान कयि, अर्‌ मरुवेतपर गये, दमाय प-

तपर गये जर सतिपा, परीकेदार-मादि गंग लान क्षयि ` अर दन कयि. सव तीयै सान, दान. तेफष्याने विधियुक्तं ` याना कत गय. जी जेसी जह धि थी तेती ते तह करी

एवमे संपृणे यात्रा के रामजी वहुरि अपे धस आये. `

इति श्रीयोगबाक् केराग्ककरणे तीधैयात्ार्णनं चाम तृतीयः सगः॥२॥ `

४-५. ] वैराग्यप्रकरणे -दिवसव्यवहारर्णनम्‌। (२१) चतुथः सर्गः ४।

सथ दिवसतव्यवदहारवर्णनपर्‌ वाल्मीकिसवाच-दे भरद्ाज। जव रामजी यात्रा केअ-

पनी अयोध्यामे भावत भे, तव नगखासी रोग पुरुष ओर श्च ए- नकी वषा करत भये. भर जय जयं जय शद युखते उारने रगे अरुप्रमहास्य करने लगे भौर नैसे हका पुत्र जपते सवगम आवत है, तैसे रामचंद्र अपने षरं भये. पे राजा दशरथो प्रणामकर फिर वसिष्ठजीको प्रणाम कर, एर सब सभाके रोगो को यथायोग्य मिले फर अंतःपुरेम आवत भये. कौरव्या आदि जो माता थी, इनको पथायोग्य नमस्कारे ओर जो मरै, बंद, कटनी थे तिन सबको मिले.

हे मर्रान ! इसप्रकार रामजीके आषनेका उत्साह अष्टदिनपर्यत होतार. बा समयम कोटे पिरे अवे, कोई सेने अपे, तिनको दान, एण्य करत बाजे बजत उत्साह हभ. माट-आदि स्तुति करने रगे. तदनतर रामजीका आचरण इजा सो घन, प्रातकामें उकके श्ानसंष्यादिक सकतम करते, बहर भोजन करते, बहुरि भाई धुको मिर, अपने तीर्थकी कथा करते. देवदार द्रानको वाता कर- ते. इसप्रकारसों उत्साहक, दिन-रातको बितावते धे.

इति श्रीयोगवारिठवेरास्यप्रकरणे दिवसव्यब्हाखणंनं नाम च्तुथैः सगः ५॥

पञ्पमः मर्गः दिन्‌ प्रातःकर्म उठके, पिताजी दशरथको देते सो जैतेहं-

(२९) ` योगार! [एवम सैः

द्र तेनै रेजबर देखा अर वरिषिकी समाव थी तहं ठीके साथ क्था दात मजी कते हत, तहं दित रजा दय फलत भ्ये क्रि --रमवन ! जायते क. ता समयम रजी अचखा ११५६ प्रथि हिना कृमती थी. तब राजकुमार रमजीके साथ र्षण अरर" भै, भरत मनिहार गये ये, पिर तिनके साः सन स्याद मिल समै कखे, भोजन करे विकार सरन ज" मो सीवनम्ने देहर जानवर देखते तिनको माते, जर सर तेग परस कते. इपकार दिनको शिकार सुरत र~ छिन तिसान वलते अपने धमं आवे. एते कते कतेक दिन वीति, साम मजी अपने अंतःपुसं आय स्थका लग कफे ए- कुम धितम करत वैटि रहते.

देमएयज। जती रजछुमारवीवेय सो वको रमरजनेय- गक दीन थक रर इको विष्यर्नको लाके शरसे दरस सेय, यख कति धग, पीत रणै दगया. जते कपट एके पीत ह्व जाता दै रामजीका पुष पील देगवा.अरभे क्मरमर भदै दैत सूते युखकमखपर तरह दे सने रो, सह्‌ शेम हेदन री. मर इच्छा मि. शत शषय . अते इरा तार निमेर हेता ते श्छास्गी मठनतेरदित वसप तर नेर होगया ते वासना निश्‌ होते दििदिनशरीरमिर्मठ हेगयाअरुजहं वैतह चितासयुरकैठे दि जावै, नदी -अर्‌ कैं तव हाये भिदुक धे वर, जव लर्‌ मीत किमि दमभे) सान्ाका समयहुखाहे ोअव्‌ (1 अरय विदरि.जती एने,वारने,चटने,पहिेकी शरिया है सो सब पिरप शेय

१, ] वेराग्यप्रकरणे-कारयवर्णनेम्‌ (२३)

गई, पसे रामचदरमी भये. तव ल्म अरु शपू रामजौको संशायसंयुक्त देसे, तिसप्रफार हो कैठे, तब्‌--

दरार यह वाता सुनके रामजीके परस आय यैठे भरुदेसे तव महाङृराहोगये हइ विताकरके आतुर हए कि-हाय २इनकी क्या . अवस्था हृ है ! इस शोकके शये रामजीको गोदमं वैगये रपू ' नेलगे. फमल युंदर शब्द करके बोटेकि-दे पुत्र! तमको क्या दुःख प्राप भया दै जिकर ठम शोका हूयेहो तब रामजीने काकि- दे पिता ! हमको तो दुःख फोऽनही है पैसे कचं चुप दोरदे. जव कैतेक दिवस इसप्रकार व्यतीत मये, दशरथ शोकवार्‌ हए अरु शियांमी शोकवार्‌ भई. अरुराजा चत्री मिरे विचार कले. गे, क्ि-पु्रका किसी गैर विवाहकरना. अर्‌ यही विचार क्षिया रय्या हु े१जो भेर पुत्र रोकवार्‌ शेय.-हते दै. तब वसिषठजीसे पूछा कि हे युनीश्र ।मेरे पत्र शोकम कयो रहते ! तब-

वसिष्ठनीने कहा कि-हे राजम्‌! महापुरषको जो कध दोताहै सो किसी भख कारणकर नदीं होता अरु मोदभी अख कारण- कर नहीं होता अर शोकमी अखकारणकर नहीं होता जेस पथ्वी, जर, तेज, वायु आकाश्च जो महामूत है सो भदपकायभे विका- रवार्‌ नीं हेते. जब जगती उत्ति भरलय होता दै तन्‌ त्रिकार्‌-' वार्‌ होते दै तैसे महापुरुष अलका विकारार्‌ नदीं होते. ताते हे राजम्‌ ! तुम शोक करने योग्य नह अरं रामजी जो शोकवार्‌ हूए सोभी किसी अथंके निमित द्ग, पीडे इनको सुख मिलेगा; तुम शोक मत करो.

हति श्रीयोगवारिषट वेराभयपरकरणे कार॑बणनं नाम पमः सगः ५॥

(२९) योगश [ ष्टः सैः पठः सगः &।

(1 अध दिश्वामित्रागमनवर्णनम्‌

बाहभीकििवाच-दे भरबान ! पे कपिनी अरु राजाद- शरथ विचार करतेथे तिसकारे विशवामित्रजी अपने यके सहाये अथ आवत मये. राजा दारणे गृहे आयकर, परियासो कहत भये कषि-राजा दरारथसे को कि-गाधिके पुत्र विश्वामित्र वारं खडेदै तव दसम ओर दहेपोरियाको जाय कहा किह खामी ! एकवडत- पखी दारे आय खडेहैऽन्दं हमसे कारे फि-राजा द्रारथके पास जाय कह, कि-विशामिभर अये दै सो सुनके संपूरणं मंडठेशवरकर पूज्य जो राजा दरारथ सवनसदित अपने सिंहासनपर कै हैभोर जो यहे तेज संप्र, तिनसेकहा फि-विश्रामित्रने हमसे का हैक दशरथ पास जाय क, फि-गाधिके पतरविश्वामित्र वाहर से है.

है जव हमार बड पौरियाने राजां कहा तव राना युन सुण ।पहासनसे उट खड हए अर चरणोकरके चे ओर पतिष्ठजी ओर दूरी ओर वामदेवजी. अरं गना चर सति कृत चटे.जबजहति विामतरनी दषटिभाये तव तह. ते प्रगामकने ठ. जह वापर रीर राजाका छागे तहं एष्वीभी

हैते पिधामि्रजभिकी नादपरकाशितदेखयर जनै सुवरणकी

प्रकारता है अर हृदये (1

भसव्नवानः दरति मह शातिस्प षर्‌ हाव योद स-

भर गहत पि प्रणाम करत राजा दरारथ , परजा गिरे जसे सुय सदाशिव चर्णोपर जायगिरे ये,

} ६.1 ेरग्फ्रकरणे-विश्ागित्रागमनवणेनर्‌। ५)

तैसे मस्तक नभाय कर, कहा क्षि-गेरे षडे भागय हुये जो तुह्ारा दैन हमा दै. हमरे उपर तुमने बड अन किया दै.इमको बदा आनंद प्रभा है जो अनादि,अनैत है आदि, धय, अते रहित ` अविनारी है एषा जो जरम आन रै सो तद्रि दरौन कमु. ` इको प्रा हुमा रकि अवतारे. भगवस्‌ ! आर्जभेरेबडे भागय हृए है जोम धमौसाके गिननेमे आउगा.कारैते फि-जो तुम रेरे रार निमित्त अयि हो. हे मगवर्‌ पुद्यारा भाना हमरे द्यम नही था अरं तुमने बडा अरुग्रह फियादै. जे दूरं कों कायं केके पवी प्र आद तैपे तुप ग्रो रिं भावते द, अरु समते उष रं आचते ह. फते किते दो गुण है एक तो क्रियका खमाष तद्या दै भर दूरा ब्ह्मणका खमावभी वद्यसे भापता दै, अर शुभ एुणकर संपूण होः हे सुमीश्वर। ठम त्रियमेते बाह्मण मये. देसी की सागण्यं नहीं देसी. अर तद्रा शरीर पकाराषार्‌ दी- खता टै अर जि माणसे तुम अये हो अरं भिस मेमं तुम चि करत आये हो, तद तहं अस्तश्टिकरत अये हे, एषा दृष्ट आता ह. एनीशवर! ठम अयि सो तुदयरे दीन कर र्षक बहाम है. हे मरढाज ! इपरकार राजा दशरथ विशवामितरते बे अरु रिषन आयकर, विवामित्रको कंठ रगायके पिठे. ओर जो मेदरे राजा थे सो बहुत प्रणाम कर, इसप्रकार सव मिरे. तव वथाः -मितरको राजा दशरथ षरे रे आये. जहां राजसिंहासन था, तद आनकर बिठया अरुवसिष् वामदेवो बिढवे. ओर राजा द्रारथने . िशवागितरका पूजन किया, अरुअय्य पादातरैन करके रदकषणाकिके चरि बरिष्ठजीने रिशवामित्र पूजनक्िा अर तिधापित्रने वसिष्ट जीका पूजन किया; ते अन्योन्यपूजन भाः इसपर पूजन करके सब अपने आसनपर यथायोग्य कठ. .

२६) योगवापिे। [ समः समैः

तब राजा दशरथ बोटे रिरे भगवद्‌! हमरे बे भाग्य रै जो ठार दैन हणा. जते कोड तको जपरतप्तरि होबे अर जन्मा धको नेत्र प्रष हो, सो आनद पत्र, जैसे निथैनको चितामणि प्रा हेमे, अरंआनंदको प्रवे भरु जैसे किसीका वपव मरा होय, सो षि. मानप्र चदा हा आकाशते अषि, उपक जैसा भानेद प्रा दे तैत ह्रे दान कर, आनदो पराप हमा दृ हे युनीशर ! ु- हारा आना जिसके अर्थं हुभा दै, सो कपा कफे एलो. अरु जो ठ्यारा भे सो पूणं हुआ जानो. कते छि -रेसा पदाथे कोई ही है, जो तुमको देना कठिन है. सव मेरे वदमान दै. गो तुरा जथ सो निश्चय कर, जामे योग होयरहा दै. जो कृ ठग आक्ञा करोगे सौ मेँ देडगा. इति श्रीयोग० वैरा० दिूमि्रागमनवर्णनं नाम षष्ठः सगः ६॥

प्म सुगः ७। सथ विन्रापिनेच्छावर्भनप्‌ वास्मीकि उवाच दे मान जव इपुप्रकार राजा द- शरथने क, विशवागिञर, सो दहत भन्न ,अर्‌ रोम सड शे अये. भे परौमासीके चरमा देके कषरागर प्रर होता दै तैसे प्रन्न होक, कत भये क्षि-हे पा | नदे भोकषि तोरपुती ह, ह, दूष वरिष्ठ तदये गुरं ता राज्‌! जो भेर प्रयोजन सो तुय आमे प्रर शबण क. दरव नन आम या सो जेव रन कता तवरक्षस मारीच अरः एबाहु उस यज्ञो

७] वैरागय्रकरणे-विशराित्रच्छाणनम्‌। (२७).

तोर डारते है. जहा जहा मँ जायकर यत्न करताहू तदं तहां आय- करअपवित जो रुधिर अरमा अरुअस्ि सो डासते सो स्थान यतन कएनेयोग्य नदी रहता. ओर ऋरि ओर मेर करने रगा हः ` ताभी उसी भकार अपवित्र कर जाते दै. तिनके नादा केके नि- मित्त मे तर्हारेपास आया हं कदाधित्‌ एसे कटो कि-तमभी ते समथो; तो दे राजद्‌ | मेने यज्ञका भरम करिया है, तिसा भग क्षमा ह, जोऽसक भे शाप दे$,तो व्ह मस्म हो जव, परंतु शाप फरो धूथिना होत नही. अरं क्रोध कयते यत निष्फल दोजाता दै, अरं जो मे बुपदय शं तो षद राक्षस अपकरत्र वतु हार जाते है ताते पुम्हारी शरण आया मेरा कायं करो हे राजस्‌ तुम्हारे जो रामजी पुत्र है, सो केमरनयन काकपक्षयुक्त है इससे यह जो वारक द्‌- सरो साथ रहे है तिसको मेरे साथ देहु, जो राक्षसोको मर; तब मेरा यग सफर होय. ओर तुमको पूसा रोक करना नदीं चादि कि- मेरा एत्र गारक है. यह्‌ तो बडे इदरके समान शरीर इनके समीप वह्‌ राक्षस ठर सकेगे. जेसे सिदके सन्यस शगके बे ठहर नहीं सफते, तैसे तुम्हारे पप्रेफि सन्भुख राक्षस टर सके.ताते मेरे साथः उनको तुम बु . जो तम्हाराभी धमरे अरुयश्चगी रह. मेरा कायेभी होवे. इसमे संदेह नहीं करना.

हे राजन्‌! एसा पदां परिखोकीमे कोह नदीं जो रामजीका क्रिया कड होवे. हीते वहारे जाता ई. यद भरे करतो दाप रग. अरं इनको कोई विरभ होने देगा अरजो तेर पुत्र वस्तु है सो भे जानता द; ओर षसिष्ठमीहू जानते दै. ओर जो त्नान- वाम्‌ प्रिकारदरी होयेगा, सोभी इनको जानता दोयगा. ओर कोदैी सामरध्यता नी है जो इनको जानसकै. ताते तुम इनको मेरे साथे जो मेरे काकी सिदि देय.

८२८) योगवारि [ अषमः सुगः

दरान्‌ !जो समयपर कथे दयता दै, सो थोरे कनेरेभी बहत सि पाता है.जैसे दितीयके वंरमाको देखे, एक त॑त्‌ (धागे) का दान्‌ किया हेय सोषी बहुत दै, पी वञ्चका दान मि तोम तेसा काये सिद्ध नरी होता, समयपर थोडा काथभी बहुत (पाक्‌ देता सम्यविना बहृत्‌ कायैभी भेरि एटको देता दै. ताते आप मेरे पाय रापजीको दौज

सुवा मारीच बडे दैप है. सोभायकः मेरा यत संडन करते है. जव रामजी जगे, तव कह भाग जर्वैगे रामजी के अगे खन होय पके. इनके तेजसे वह सव अरब हो जगे. जे सथ तेज- करे तारागणक प्रकारा छिप जाता दै, तैसे रामजीके दानसे वह्‌ स्थित .जेसेगरुडके अगि नही ठहर एकत, तेरे रामजी आगे राक्षस ठहर सगे. देखकर मागजा्ेगे. ताते तुम मेरे साथ देहु जोमेरा काथं दवे अरुवुम्हारा धमेभी रहे. रापजीके निमित्त सु देह मत कना-पह राक्षसोकी सामयं नही जो रामजी निकट आदे अरे मेभी रामजीकी रका ङर्गा.

वारमीकि उवाच-रे माज गिाभितने एसा कहा राजा ददाथ सुनकर चुपरहे अर गिरपडेएक गत पय॑ पडे रहै.

इति श्रीपोगवासि वैराग्यप्रकरणे बिशामित्रेच्छावर्णनं नाम सषमः सगः ७॥

[र

अष्टमः सगः

अथ दरथोक्तिदेनम्‌ | 0 उवाच भरगज ! एक युं पडे राजा यरय भर महामोहो पराप शय गय. प्ते रहित

<, ] वैराग्यप्रकरणे-दशरथोक्तिविणेनम्‌। (२९ )

राजोवाच-दे मुनीश्वर ! तमने क्या कहा ! रामजी अभी तो कुमार है. रावि, अस्रविदयाभी सीवेनदीं है अभी तोपलनकी शय्यापर श॒यन करनेवारे है, वह युको क्या जान अंतपुरमे शिय- नके पास वैठनेवाठे है राजङ्मार बारकनके साथ सेलनेवछेहै ओर कदाचित्‌ रणभूमि देसीहू नरी दे. भृढकटीको दायके, कदाचित्‌ युद मी नहीं किया. अर कमल्की नाह जिनके हाथ है अरु कोम जि- नका शरीर है, राक्षसे साथ युद्ध कैसे करगे ! कह प्यरका अर कमटक्ाभी यु हा है! रामृजीका बपुकमलसमान फोमूठ है जर्‌ वह राक्षस महाक्र पत्थरकीनाह हैःउनके साथ इनका युद्ध कैसे दोषेगा? हे मुनीश्वर ! मँ नव सहल वष॑का हुभा द; अब दर्वा सदत लगाहै, वृद्ध हुआ. यह वद्धावस्यम मेरेधर पतरहूव हैमो चारके मध्य रामजी क्मरनयन, कष षोडा वषे है. अर युश्चको बहुत भयतम दै. अरे मेरे प्राण है. रामजीषिन मेँ एक क्षणभी रहि नदी सक्ता. जो तुम इने ठे जाओगे, तो मेरे प्राण निकर जागे. खृतकदो जारगा. हे युनीश्वर ! केक मेराही एसा सेह सो नदीं है. उनका माहं

जो क्षण, भरत, राच, अरु उनी माता जो दैः इन सवहीके प्राण राजी हे जो तम रामजीश्नो रे जागे, तो हम सबही मर जागे. वियोगकरफे जो हमको मारने अयिहो तो ठे जाओ. हे मुनीश्वर ! मेरे चित्तम रामही व्याप रहे हँ ! तिनको गे वचरि साथ कैसे देकं मेँ उनको देखते देखते प्रसन्न होता जैसे पूणमासीके चंद्रमाको देख- कर, श्ीरसु्र प्रसन्न होता है, अरु चंद्रको देखकर चकोर प्रसन्न होता दै अरु लातीके मेष दको देखकर, पीहा प्रसन्न होता दै, तैसे रामजीको देखकर, भे प्रसन्न होता दः तव रामजीके वियोगकरके मेरा जीवन कैसा होयगा हे यनी वर ! मेरेको रामजी जैसे प्रियतेषे सभी नही अरु धनय देसारिय नदी, अरु राज्यमी रेषा श्रि नदीं

(३०) योगब [अष्टमः समैः

ओर पदा्मी को कोदैरामकेसमान नरहरि पेसेरामजी पयर

हे नीर! तुदचारे वन सुनके भे बडे शोकको प्राप हआ ह. भर बे अभाग्य जय नो तार आना इप निमित भा द. तदार वचन सुनकर जैमे कमलके उपर प्रकी दषा होय एसी व्यथामेर को होती दै अर पर्थरकी वर्षते जेते कमर नष्ट होजाते दह तैसे त. हारे वचनसे मेरी नष्टता होजायगी. जेसे धडा मेष चट्‌ अपे, तामे जडा पवन्‌ चरे मेधकी गंमीरताका अमाव होय जाय तेसे व॒द्यारे उचने मेरी बही प्रसननताका अमाव होय जाता दै. जसे वसंत ऋतुकी मजरी, ज्ये आप्र सूख जाती तैसे तयार बचन दुन, मेरे हद- यी प्रसरता जर जाती है. हे युनीश्वर ! रामजीको दनम्‌ भे समर्थ मरी. जो तुम इहो तो एक अक्षौहिणी सेना मेरी दे, सो वड़े शुर्‌- वीरो दैजिसफो शसखविदया,अखविययाम॑जषिया, सव आकती है. ओर्‌ सवे यदधमं चतुर दै. तिनके साथमे तुारे संग चरता हवा जाये उनको मूग. अर हस्ती, घोडा, रथ पयदे पूवी चतुर- गिनी सेनाको साथ ठे जाओ. जर्‌ जो तु्चरे यक्षे संडनहारे है तिनका नार करो.अरं एके साय पै दर नकर स्रगा. जो कदा- चत्‌ प्संडनशार इमेरका भार अर विशववाका पत्र रावण होवे तो युद्ध मे समं नी,

युनीश्र ! आगे भरे बडा प्रिर

सीको नदी था. जो मेरे निकट वाको मेँ देत अवभेरी शास्वा

डैः द्स्‌ कार रावे साथ युद = रे अभाग्य है जो तुरा भना इसनिमित्त अव मेरा वसा पराक्रम नहँ रावणस पता हः केवट नदी कपत; इरा देवता सब रावणसे पते जरु

२. ] वैराम्पप्रफरणे-पसिष्टसमाशासनवणेन्‌। ८३१ )

रक्षस सव उसके वशम वत्तेते है. अन किसीको शक्ति नीह जो राष्- णके साथ युद्ध फेरे, इस काठ पह बडा सूरी `

हे मनी! जब मेरी समथ॑ताभी नहीं रही, शजङ्गमार राम- जी कैसे समथ दवैगे अर्‌ जिन रामजीको ठेने तुम अयि हो सो रोगी हो रे है, उनको चिता एेसी भाय ठगी है, जिससे वह महा- दुबल होगे दै. अरु अंतर एतम बट रहते द. साना, पीना इ्यादिक जो राजङ्कमारकी चष्ट है, सो सव उनको वरिरस होगरं है अर मँ नदी जानता किं-उनको क्या दुःख प्रा हुवा है. जेते कम- सूखे पीतवणं होजाता है तैसे उनका सुख होगया है, उनको युद्ध करनेकी समथता नदी. अरु उन्दने अपने स्थानते बाहरी प्वीभी नरी देखी है, सो युद्ध कैसे करेगे !

हे मुनीश्वर! षह युद्ध करलेको समथं नदी दै, अरु इमे प्राण वही दै. जो उनका वियोग होगा तो हमारा जीवना नहीं होषेगा. ते जर जिना मख्टी जीवती नरी है, तेसे हम रामजी भिना कैसे जगी भरु जो राक्षसफे युद्धनिमित्तक हो तो हम तहयारे साथ चठ अह रामजी धु करको योग्य नरी.

इति श्रीयोगवारिष वेरम्यभकरणे दशरथोक्तिवणनं नामाष्टमः समैः <

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नवमः सर्गः ९।

अथ चसिष्ठखमाश्वाखनवभेनम्‌ ।. ` वार्पीकिस्वाच-हे भरद्वाज ! जन इसप्रकार राजा दव रथे कहा, तब महादीन जै मोदसदित अधीयंवार्‌ पचन सुनकर ऊोधर्तो विश्वामित्र कहत भये.

(स) योगबाणटि। [ नवमः समैः

१० ध्मको

विशवामिन उवाच रद्‌! दम अपने एमि कुरो, यह प्रति तमने करीदै कि “जो तुदचारा अथ दवंगा कंग; भौर पणहुभा जानना पा तुमने कडा दैःजव तुम ूर्मफो लागते हो ओर जे तुम सिंह दो र्गो नाई भागते हो तो अगः एतु समि सुरैर कोरी इभा. जेसा चमा मड. शीतता होती ६, अभि निकसता नरी ई, तेष तद्यार कुरुविषे रसा कंदाचित्‌ नह हुमा, अरं जो तुम ₹रते हो तो कर, हम उ६ जगि" कते कि~त गते शद जातारै रु यह तुम यगय था, अर तुम वते र्े,राज्यकसतेरह, जो कडु हवेगा सा हम सभ ठैय, अरं जो अपने परमको तुम तते हो तो सयग दी"

दाटपीकिस्वाच-हे मरदाज।इतपरकार जय जयत कोषवा- देकर, विशामित्र वे, तव इनके क्रोध कनेते सकल पी कर पने ठगी अर इ्रद्कि देवताभी मयो प्रप्र है; किये स्या हुभा ? तव्‌ वरिष्टजी बोरे. _ वरिष्ठ उवाच्‌ दे राना इडे छर सव परमाथी हृष ओर तुम अपनं धर्मो कयो स्यागते दो! हमर सन्मुख तुमनेकह कि जो तद्य अर दवे, सो पै पूथे करगा.? अद तुम श्या मागत ! रामजौ साथ दो, जर यह्‌ तु्यरे पुत्रके रक्षा करगे. जे सते असती रशा गरड करते है, तेत त्र पत्री रशी पक, यर्‌ यह के पुपर सो श्रवण करो. इनके समान्‌ किर नरी ये साक्षात्‌ वर सूतिं अरु मौत है, साक्षाद्‌ पव यूति ₹.अरे एसा तली कोऽ है अरु तपा खानि है अर इनकैसमानगोडबुधिपार नही देवरद सामन ६. नदी ६, अरं जच-वियर्ती अरहर एमन कोहं शरभ कि मजरी उल मउ मही है. ऋत

" चा यु ध, एक जया रं दूसरी सुप्रभाः

` ९] वेगागय्काणे-परपिषठतमाश्ासनवणन्‌। ८३६

सो ये ऋषिको दीनी मरं जया थी तिस दैत्ये माले निपि्त पचसो प्क अरु युप्रमके गी पवित पुत्र भयेये सो सबदेतयोकेनासनिमित् उलि भे सो कचा इनके मिमान मति धके स्थित हई है, ताते इनको जीतनेको फो मं नही | है. मिसे साधी विलामित्र वे सो त्रिरोकी्े सों नहीं ड. ताते इनके साथ तुम्‌ अपने पुन्‌ दो, अरु संशय मत क्रो, कष सकी सामध्य नही जो इनक होते दम्प कड कोऽ एषि पके. इनफी दष्ट देसनेतेदुःखफा अमाव हो जाता दै. जैस उदयते अंधकारका अभावं हो जाता है तैसे. हे दनके साथ तुम्हारे पुत्रको खेद कदां हषे ! त॒म श्वा- डके इतके हो अरुदसरथ दष्टा नाप दै. सोदरे जत पमाला जब अपने धम स्थित रहँ तो भौर जीते षमी एरना कमे होयगी ! जो कट अष पुरुष चेष्ट करते है तिनके असुसार ओर जीव कते दै. जो ठमसरिले अपने उनकी पाठना नगे तब ओरसो कहा बनेगी १अर तुष्टे कस्मै पेमा कबहु नहीं वः तति अपने धको त्यागा योग्य नही तुम्‌ अपने पुत्रको दो. अरु जो तुम उनको मयकरफे शोकमान होवो तोभी ना मति कहो. भोर मरयारी काठ आयकर सित हेवे तोभी विखामित्रके विद्यमान र- : हते तद्ये पतक फट होवे नदी, इनके विद्यमानरहते मराभी नर जी उता है. तुम रोक मत करो; अपने पत्रकोशनकेसाथ दो. अर जोन दगे तौ दोऽ प्रकारका ठणहारा रमन दोवेगा; एक धूम