मुद्रक तथा प्रफाशक--मोततीछाफ जाटान) गीताग्रेस) गोरखपुर

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या श्री: स्वयं सुझृतिनां भचनेग्यलक्ष्मीः | पापात्मनां छतथियां हदयेपु चुछ्लिः

श्रद्धा सता फुलजनप्रभवस्य॒ लज्ञा

ता त्वां नताः सम परिपालय देवि विश्वम [

छघं० २००४ में २५३४ सरफ ४+१०१२५७०

पसं०. २०२५ सप्तरा पत्करण ७५१००० सं० २०२७ घभष्टादश संस्करण ७५॥०००

>> नल लेननेननन++ नमन छ्ुछ् ५१६०१२७०

पॉन छा साठ इजार दो सौ पास

मूल्य एक रुपया सजिदहद पक रुपया पचीस पेसे

बिल 2>म 5 5

पता-गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस ( गोरखपुर )

श्रीदुर्गदिब्ये नमः

विषय-सुची

विपय

२-निवेदन ०५

२-सप्तस्छो की ढुगों ३-अ्री दुर्गाशेत्त रशतनामस्तोत्रम्‌ ४-पाठविधिः १-देव्या: फ्वचम्‌ २-अर्गलास्तोन्नस्‌ ३-फीलकम्‌ ४-चेदोक राश्रिसूक्तम्‌ ७-तन्‍्त्रोक्त राप्िसूक्तम्‌ ६-श्री देव्यथर्व शी प॑ म्‌ ७-नवार्णविधिः ५-श्रीदुगोसप्तशती ३-प्रथस अध्याय--मेघाऋ्षिफा राजा सुरथ ओर समाधि- को भगवतीकी महिमा बताते हुए मथु-केटम-बधका

प्रसद्ग सुनाना अर -हितीय अध्याथ--देवताओंके तेजसे देवीका प्राटुर्भाव और

महिषासुस्की सेनाका वध 20% ३-तृतीय अध्याय--सेनापतियोसहित महिषासुरका वध 2-चतुर्थ अध्याय--इनन्‍्द्रादि देवतारओंद्वारा देवीकी स्तुति 5-पश्चम अध्याय--देवताओंद्वारा देवीकी स्ठुति, चण्ड-मुण्डके मंखसे अम्बिककि रूपकी प्रशंसा सुनकर झुम्भका उनके पास

दूत मेजना और दूतका निराश छौटना

पृष्ठ संख्या

६९ ३० ३६ ४१ डर है. परे

छ्‌ 6

७६ ८९ ९७

विषय

६-पछ क्षष्याय--धुम्तलोचन-वध ७-सप्तम क्षष्याय--लण्ड और मुण्दका वध ८-अष्टम भ्रध्याय--रततंबीज-वभ ०-नवम अध्याय--निश्म्भ-वत १०-दशम अध्याय--शम्भ वध ११-एकादश अध्याय --देवताओं द्वारा देवीकी स्तृति तया देवीद्वारा देवताओंकोीं वरदान ? ३-ट्रादवा अषध्याय--देवीनरित्रेक्ि बाठका सादात्म्य १३-श्रयोददा कध्याय--सुरथ और बेश्यफो देवीका बग्दान कर के ४-उपसंदार १-आग्वेदोक्त देवीसूफकम २-तन्त्रोक्त देवीसक्तम, इ-प्राधानियां रहस्यम, ४-थे फृतिक रएस्पम ७५-मूर्तिरहस्पम्‌ ७-क्षमा-प्रार्थना -श्रीडुगामानस-पूजा -दुर्मोद्धानिशन्ासमाला १०-दिव्यपराधक्षमापनस्तोनम्‌ ११-सिद्धकुश्षिकास्तोच्रस्‌ १०-सप्तशतीके कुछ सिद्ध सम्पुर मन्त्र *३-श्रीदेवीजीकी आरती १०-देवीमयी

>> « “००4३-०३ “८८२7 07227# ४“+ “' '

यृप्ठ-संम्ष्पा

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२७८

हा

४“ नमश्वण्डिकाये

प्रथम संस्कृरणका निवेदन डेवि प्रपक्षातिंहरे पसीद प्रखीद मातजंगतो5खिलस्य प्रखीद्‌ विश्वेश्वरि पाद्दि दिदरय॑ त्थमीश्वरी देवि चराचरस्य दुर्गासतशती हिंदू-घर्म का समान्य ग्रन्थ है | इसमे मगवतीकी कृपाके सुन्दर इतिहासके साथ ही बड़े-बड़े गढ़ साधन-रहस्य भरे हैं | कम, भक्ति शोर ज्ञानकी त्रिवित्र मन्दाकिनी वहानेवाला यह्द प्रन्य भक्तोके लिये वाज्छाकब्पतरु हैं सकाम भक्त इसके सेवनसे

मनोउमिलषित दुरूभतम वस्तु या स्थिति सहज ही प्राप्त करते हैं .

और निष्काम भक्त परम दुर्दभ मोक्षको पाकर छतारथ होते हैं | राजा |, किये] गन

छुरथसे महर्षि मेधाने कहा था--०तामुपे हि महाराज शरणं परमेश्वरीम्‌ |

आराधिता सत्र नृणां भोगल्लगापवर्गदा |! मद्दाराज ! आप उन्हीं

भगवती परमेश्वरीकी शरण ग्रहण कीजिये वे आराधनासे प्रसन्न

> छ्लोकर मनुष्योंकी भोग, खगे और अपुनरावर्ती मोक्ष प्रदान करती हैं |

इसीके अनुसार आराधना करके ऐशखर्यकामी राज[ छुरधने अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया तथा बराग्यवान्‌ समाधि वेहयने दुर्लम ज्ञानके द्वारा मोक्षकी ग्राप्ति की अवतक इस आशीर्वादरूप मन्त्रमय ग्रन्यके आश्रयसे माद्धम कितने आर्त, अ्थर्थी, जिज्ञासु तथा प्रेमी भक्त अपना मनोरथ सफल कर चुके हैं | हषकी वात है कि जगज्जननी भगवती श्रीदुगोजी- की कृपासे बह्ली सप्तशर्ती संक्षिप पाठ-विविस॒हित पाठकेंके समक्ष पुस्तक- रूपमें उपध्यित की जा रही हैं | इसमें कथाभाग तथा अन्य बातें वे ही हैं, जो 'कल्याण? के विशेषाइ्ु “संक्षिप्त माक॑ण्डेयअह्मपुराणाझ्ः में प्रकाशित द्वो चुकी हैं | कुछ उपयोगी स्तोत्र और बढ़ाये गये हैं |

इसमें पाठ करनेकी विधि स्पष्ट, सरल और प्रामाणिकरूपमें

' द। गयी है इसके मूछ पाठकों बिशेषतः शुद्ध रखनेका प्रयास किया

(६)

गया है | आजकल ग्रेस्ेरम छपी हुई अभिकांश पुस्तकें अशगुद्ध निकछ्ती हैं; किंतु प्रस्तुत पृस्तकको इस दोपसे बचानेकी यथासाव् चेश की गयी पराठकाकी सुत्रिधाक्े लिये कडीं-कहां महत्त्वपूर्ण पाठन्तर भी दे दिये गये हैं शापोद्वारके अनेक प्रकार बतछाये गये हैं | कवच, अगला और कीछकके भी अर्थ दिये गये हैं | वंदिक-तान्त्रिक रात्रि सूक्त और देवीसूक्तके साथ ही देव्यबतशीर्ष, सिद्कुभ्षिकास्तोत्र, मूंल सप्तछोकी दुर्गा, श्रीदुर्गाद्वान्रिशनाममाछा, श्रीदुर्गाशेत्तरञ्मतनामस्तोत्र, श्रीदुरगमानसपूजा और देन्यपराणक्षमापनन्तोत्रकों भी दे देनेसे पुस्तक- की उपादेयता विशेष बढ़ गयी है नत्रार्ण-विधि तो है ही, आवश्यक न्यास भी नहीं छूठने पाये & सप्तशतीके मूछ इछोकोंका पूरा अर्थ दे दिया गया है तीनों रहत्येर्ि आये हुए कई गूढ़ विपयोकी भी टिपणीद्वारा स्पष्ट किया गया है | इन विशेषताअंकि कारण यह पाठ और अव्ययनके छिये बहुत ही उपयोगी और उत्तम पुस्तक दो गयी है | यदि पाठकोने इसे अपनाया तो आगे चलकर विस्तृत पाठ-विधिके साथ सप्तशवीकी बड़ी पुस्तक निकालनेका भी विचार किया जा सकता है। सप्तशतीके पाठमें विधिका खयाल रखना तो उत्तम है ही, उसमें

भी सबसे उत्तम वात है. भगवती दुर्गामाताके चरणोमें प्रेमपूर्ण मक्ति श्रद्धा और भक्तिके साथ जगदम्बाके स्मरणपूर्बवक सप्तशतीका पाठ करनेवालेको उनकी कृपाका शीघ्र अनुभत्र हो सकता है आशा हैं, प्रेमी पाठक इससे छाभ उठात्रेंगे | यद्यपि पुस्तककों सब प्रकारसे शुद्ध बनानेकी ढी चेश की गयी है, तथापि प्रमादवर कुछ अशुद्धियोंका रह जाना असम्मव नहीं है। ऐसी भूछोंक्रे लिये क्षमा मौगते हुए इम पाठकोंसे अनुरोध करते हैं कि वे हमें सूचित करें, जिससे मविष्यर्म उनका छुधार क्विया जा सके।

--हनुमानग्रसाद पोद्दार

अथ सह्तँ'छोकी दुर्गा सज्रिव उदाच--- देवि त्व॑ भक्तसुलसे सर्वकायंवरिधायिनी कली हि. कार्यतिद्धथर्थमुपांय ब्राहि यज्नतः देव्युवाच-- श्रुणु देव प्रवक्ष्यामि कली सर्वेष्टताघनम्‌ | मया तवेव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः अकाश्यते अस्य शत्रीदुर्गासप्छोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषि: अनुष्ट॒पू छन्‍्दः श्रीमहाका ली महालक्ष्मीमह सरस्वत्यों देवता। श्रीदुर्गापीत्यथ सम्क्तोकीदुर्गापाठे विनियोगः | ३» ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा बलादाकृष्य मोहाय महामाया ग्रवच्छति ? हुगें स्‍्मृता हरति भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थेः स्मुता मतिमतीव शुर्भा ददासि | दारिद्रियदुःखमयहारिणि का तवद॒न्या सर्वोपकारकरणाय सदाद्रंचित्ता ॥२

(८) तर्वमप्नलमझल्ये. शिवे.. स्वार्थत्ाधिके झरण्ये श्यस्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते शरणायतदीनातंपरित्राणपरायणे | सर्वस्यातिंहरे देवि नारायणि नमोउस्तु ते सव॑स्वरूपे सर्वेशे.... सर्मअक्तिसमचिते | भयेभ्यत्राहि नो देवि ईगें देवि नमोउस्तु ते

रोगानशेपान पहुंि तु रुषट्टा तू कामानू सकलानभीष्टान्‌ लामशितानां विपन्नरार्णां

त्वामाश्रिता प्राश्रयतां प्रयान्ति सर्वावाधाप्रशमन प्रेछोक्यस्यासिलेगरि | श्दै हि पएकमेव_ त्वया कायमस्मद्वरिविनाशनम्‌

इति सप्तस्छोकी दुगो सम्पूणा

>>

भीदुर्गायं नमः

श्रीदु गाशेत्तरशतनामस्तोत्रग्‌ ई-धर उदाच शतनाम पग्रवक्ष्यमि शृणुष्व कमलानसे यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा श्रीता भवेत्‌ सती १॥ 3४ सती साध्वी भवग्रीता भवानी भवमोचनी | आर्य दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शलूधारिणी || २॥ पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥ ३॥ सवंसन्त्रसयी

सवसन्त्रयी सत्ता सत्यानन्द्खरूपिणी अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ४॥

शंकरजी पार्वतीजीसे कहते है--कमलानने | अब मैं अशेत्तरशत- नामफा वर्णन करता हूँ; सुनो, जिंसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्रसे परम साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती दे १॥

3“सती। साध्वी) हे भवप्रीता ( भगवान्‌ शिवपर प्रीति रखने- वाली )) भवानी; भवमोचनी ( संसारवन्धनसे मुक्त करनेवाली ); आर्या) दुर्गा, जया; आद्या। १० निनेन्ना; ११ झूलवारिणी; १२ पिनाकधारिणी, १३ चित्रा; १४ चण्डघण्टा ( प्रचण्ड खरसे घण्टानाद करनेवाली )) १५ महातपाः ( भारी तपस्या करनेवाली ) १६ मनः ( मनन-शक्ति )) १७ बुद्धि: ( बोधशक्ति )) १८ अहंकारा ( अहंताका आश्रय 9 १९ चित्तरूपा) २० चिता; २१ चितिः ( चेतना )) २२ सर्व- मन्न्रमयी। २३ सत्ता ( सत्‌-खरूपा )) २४ सत्यानन्दखरूपिणी, २५ अनन्ता ( जिसके स्वरूपका कहीं अन्त नहीं 9) २६ भाविनी ( सबको उत्पन्न करने- बाली )) २७ भाव्या ( भावना एवं ध्यान करने योग्य २८ भव्या (कल्याणरूपा)) २९ अभव्या (जिससे बढ़कर भव्य कहीं है नहीं) ३० सदा-

१० # श्रीदुगौसप्तशत्याम्‌ #

शाम्भवी देवमाता चिन्ता रत्नप्रिया सदा। सवधिद्या दक्शषकन्या. दकषयज्ञविनाशिनी ॥| ५॥ अपणनेकवर्णा पादला. पाठलाबती | पट्टाम्बरपरीधाना कलमझीररजिनी ६॥ अमेय्विक्रमा क्ररा सुन्दरी सुरसुन्द्री वनदुगा मातड़ी मतड़मुनिपूजिता | ७॥ व्राक्षी माहेश्वरी चेन्द्री कोमारी वेष्णनी तथा। चामुण्डा चंद वाराही लक्ष्मीश्ष पुरुषाकृति; <८॥ विमलोत्कर्पिणी ज्ञाना क्रिया नित्या चुद्धिदा। बहुला . बहुलप्रेमा. सर्ववाहनवाहना ९॥ निशुम्भशुम्भहननी महिपासुरमर्दिनी

गति ३११ शाम्मवी ( शिवश्रिया )) ३२ देवमाता) ३३ चिन्ता, रे४ रत्ल-

प्रिया, ३५ सर्वविद्या। ३६ दक्षकन्या, ३७ दक्षयशविनाशिनी, २८ अपर्णा ( तपस्याके समय पत्तेकों भी खानेवाली )) २१९ अनेकवर्णा ( अनेक

रंगोंवाली )) ४० पाटला ( छाल रंगवाढी )) ४१ पाटलावती ( ग़ुलावके

फूल या लाल फूल धारण फरनेवाली ) ४२ पद्चम्बरपरीधाना ( रेशमी वस्र पहननेवाली )) ४३ कलमश्जीररजिनी ( मधुर ध्वनि करनेवाले मझ्ीरकों घारण फरके प्रसन्न रएनेवाली )) ४४ अमेयविक्रमा ( असीम पराक्रमवाली )) ४५ प्रूरा ( देत्योंके प्रति फठोर ) ४६ सुन्दरी, ४७ सुरखुन्दरी,- ४८ बनदुर्गा, ४९ मातज्नी, ५० मतज्ञमुनिपूनिता। ५१ ब्राह्मी: ५२ माहे- खरी) ५३ ऐमन्द्री, ५४ कीमारी, ५५ वेष्णवी, ५६ चामुण्डा, ५७ वाराद्दी। ५८ लष्ष्मी७ ५९ पुरुषाकृति;; ६० विमला। ६१ उत्कर्षिणी; ६२ शाना+ ६३ क्रिया; ६४ नित्या। ६५ बुद्धिदा, ६६ बहुला, ६७ बहुलप्रेमा)

६८ सर्ववादनवाहनाः -६९ निशुम्मशम्महननी। ७० महिषासुरमर्दिनी,

के श्रीडुगोप्रोत्तरशतनामस्तोत्रम्‌ # ११

मधुकेठभहन्त्री. च. चण्डमण्डविनाशिनी || १० सर्वासुरविदाशा सर्वदानवघातिनी | स्वशास्रमयी सत्या सर्वाद्धथारिणी तथा॥ ११॥ अनेकशखस्रहत्ता अनेकास्र्ख धारिणी। कुमारी चेककन्या कैशोरी युवती यतिः १२ | अग्रोढा चेष पग्रोढ़ा बद्धमाता वलगदा। महोदरी मुक्तकेशी घोरूपा महाबला | १३॥ अग्निज्चाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपसखिनी नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ॥१४॥ शिवदृती कराली च॑ अनन्ता परमेश्वरी | कात्यायत्ती साथित्री ग्रत्यक्षा भ्रह्मदादिनी || १५॥। हद ग्रपठेलित्य॑ दुर्गानामशताष्टकस्‌ नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पावंति॥ १६॥

७१ मधुकेटभहन्त्री, ७२ चण्डमुण्डविनाशिनी, ७३ सर्वासुरविनाशा; ७४ सर्व- दानवबातिनी, ७५ स्वशासज्ममयी, ७६ सत्या। ७७ सर्वात्नघारिणी, ७८ अनेक- शर्लनदरता, ७९ अनेकास््रधारिणी, ८० कुमारी; ८१ एकफन्या, ८२ फेशोरी <३ युवती; ८४ यतिः, ८५ अप्रीढा) 2६ प्रोढा, ८७ बृद्धमाता, ८८ बलग्रदा) ८९ मद्दोदरी७ ९० मुक्तकेशी, ९१ घोरूपा;। ९२ महावछा, ९३ अग्नि- ज्वाला, ९४ रौद्रमुखी, ९५ काछरात्रि:, ९६ तपस्विनी, ९७ नारायणी) ९८ भद्नकाली) ९९ विष्णुमाया, १०० जलोद्री, १०१ शिवदूती, १०२ कराली, १०३ अनन्ता ( विनाशरहिता ) १०४ परमेश्वरी, १०५ कात्यायनी; १०६ सावित्री, १०७ प्रत्यक्षा, १०८ ब्रक्मदादिनी २--१५ देवी पावंती ! जो प्रतिदिन दुर्गाजीके इस अष्टोत्तरशतनामका पाठ करता है उसके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं है १६

१२ क# श्रीदुगीसघतशत्याम्‌ #

किक. अनरविक-० >कममिक..+ ७. %.3/िक..+क

धन ीन्यं सुतं जायां हय॑ हस्तिनमेव च। चतुर्बंग तथा चान्ते लभेन्गुक्ति शाश्वतीम्‌ १७ कुमारी पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम। पूजयेत्‌ परया भकत्या पठेन्नामशताष्टकम्‌ १८ तस्य॒ सिद्ठिर्भवेद॒देवि सर्वे! सुरबरेरपि राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्लुयात्‌ १९॥ गोरोच॑नालक्तककुछुमेन

सिन्दूरकपूरमधुन्रयेण 'विलिख्य यन्त्र विधिना विधिज्नो दि भवेत्‌ सदा धारयते पुरारिः॥ २०॥ भोमावास्थानिशामग्रे चन्द्रे शवभिषां गठे। विलिख्य प्रपठेत्‌ स्तोत्रं भवेत्‌ संपदां पदस || २१॥ इति श्रीविश्वसारतन्त्र दुर्गाणेत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम

,है3.....+ कक--०-+-०-.

+++४*7/&2-*-- वह घन) धान्य, पुत्र; छ्री। घोड़ा, द्वाथी) धर्म आदि चार पुरुपार्थ ' श्वए घन) घान्य) पुत्र) जी) थोड़ा) दवाथी) धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा अन्तर्मे सनातन मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है॥| १७॥ कुमारीका पूजन और देवी सुरेश्वरीका ध्यान फरके पराभक्तिके साथ उनका पूजन करे) फिर अष्टोत्तरत- . नामका पाठ आरम्भ करे १८ देवि ] जो ऐसा करता है उसे सब भेष्ठ देवताओंसे भी सिद्धि प्राप्त होती है | राजा उसके दाप हो जाते हैं) वह राज्यल्थ्ष्मीको प्राप्त कर लेता है १९ गोरोचन, लाक्षा) कुक्कुम) सिन्दूर कपूर; घी ( अथवा दूध 9 चीनी और मधु-इन वस्तुओंको एकत्र करके इनसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिश पुरुष सदा उस यन्त्रको धारण करता है, वह शिवके तुल्य ( मोक्षरूप ) हो जाता है ॥२०॥ मौमवती अमा- वास्याकी आधी रातमें, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्रपर हों; उस समय इस स्तोत्रको लिखकर जो इसका पाठ फरता है) वह सम्पत्तिशाली होताहै॥२१॥ +-+*#कफक्सऊ

पाठविधि:#

साधक स्नान करके पवित्र हो आसन-शुद्धिकी क्रिया सम्पन्न करके शुद्ध आसनपर बेठे; साथर्मे शुद्ध जल; पूजन-सामग्री और श्रीदुगोससशतीकी पुस्तक रक्खे | पुस्तककी अपने सामने फाए आदिके शुद्ध आसनपर विराज मान कर दे | छलाटमें अपनी रुचिके अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगा ले, शिखा बाघ ले; फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व-शुद्धिके लिये चार बार आचमन करे | उस समय निम्नादड्लित चार मन्त्रोंफी क्रमशः पढे---

# यह विधि यददों संक्षिप्त रूपसे दी जाती है। नवरात्र आदि विद्योष अवसरोपर तथा शत्तचण्डी आदि भनुष्ठानोमें विस्तृत विधिका उपयोग किया जाता है उसमें यन्त्रस्य, कलश, गणेश) नवग्रह) माठृका: वास्तु, सप्तणिं) सप्तचिरंजीव; ६४ योगिनी) ५० क्षेत्रपाल तथा णन्यान्य देवताओंकी वेदिक विधिसे पूजा होती है ऋखंण्ड दीपकी व्यवस्था की जाती है। देवीग्रतिमाकी भ्ग-न्यास और अम्न्यु- त्तारण आदि विषिके साथ विषिवत्‌ पूजा की जाती दे नवदुगोपूजा, च्योतिःपूजा, वद्धक-गणेशादिसद्ित कुमारीपूजा, अभिषेक, नान्दी स्राद्ध। रक्षावन्धन) पुण्याइवाचन, मह्नलशठ, ग्ररुपूजा, तीर्थावाहन, मन्त्रस्नान आदि; जासनशझुद्धि, प्राणायाम, भूत- शुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा, श्न्तर्मातृकान्याप्त। वहिमातृकान्यास। सश्न्यास, ख्ितिन्यासत, शक्तिकल्ान्यास, शिवकलान्यास; द्वदयादिन्य[सः षोढान्यास, विलोमन्यास, तत्त्वन्यास, अक्षरन्यास, व्यापकन्यास) ध्यान; पीठपूजा; विशेषास्य, क्षेत्रकीलन; मन्त्रपूजा, विविध मुद्राविधि, आवरणपूजा एवं ग्रधानपूजा भादिका शास्त्रीय पद्धतिके अनुसार अनुष्ठान होता है | इस प्रकार विस्तृत विधिसे पूजा करनेकी इच्छावाले भक्तोंको भन्‍्यान्य पूजा-पडतियोकी सद्दायतासे मगवतीकी जाराधना करके पाठ आरम्म करना चाहिये

(४ # श्रीदुगोौसप्तशत्याम्‌ # क००३0..0९....3.....3 24. ..4 8.22 ...3 ऐं आत्मतत्व॑ शोधयामि नमः स्वाहा हीं विद्यात्ततव॑ शोधयामि नमः स्वाह्दा॥ ही शिवतत्य॑ शोधयासि नमः स्वाहा एऐं हीं कली सर्वतत््वं शोधयामि नमः स्वाहा

9 हर]

तत्यश्चात्‌ प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजर्नोंको प्रणाम फरे; फिर पविश्नेश्यो वेष्णव्यों” इत्यादि मन्‍्त्रसे कुझकी पवित्नी घारण फरके द्वाथमें लाल फूल) अक्षत और जल लेकर निम्नाक्लित ल्‍ूपसे संकल्प करे---

5“बिण्णुविप्णुर्विप्णु; <* नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य

भ्रीनिष्णोराज्ञया प्रवतंमानस्थाथ श्रीत्रद्यणो द्वितीयपरादे श्रीश्वेतवाराहकल्पे तु नल

वबस्वतमन्चन्तरेड््टाचिंशतितमे कलियुगे प्रधमचरणें जम्वूद्वीपे भारतवर्ष मरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतप्रह्मावत्तेकदेशे पुण्यप्रदेशे बोद्धावतारे वर्तमाने

यथानामसंघत्सरे अमुफायने महामाद्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे ममुफमासे .

अमुकपक्षे अमुकृतिथों अम्ुकवासरान्वितायाम अम्लुफनक्षत्र अम्लुफराशि- स्थिते सूर्य अमुफामुकराशिस्थितेपु चन्द्रभोमचुधगुरुझक्रशनिपु सत्सु श॒भे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथों सफलशाखश्रुतिस्म्टति- पुराणोक्तफल्प्रापरिकामः अम्ुुकगोन्नोत्पन्न: अम्लुकशर्मो झहं ममात्सनः सपुन्न- स्लीयान्धवस्य श्रीनवदुगालुमहतो प्रहकक्राजकृतसवंधिधपीडानिद्धत्तिपूर्क ने रज्यदीर्धायुःपुष्टिधनधान्यसम्धद्धयर्थ श्रीनवदुर्गाश्रसादेन सर्वापन्निवृत्ति- सर्वा भीएफलावाधिधर्मार्थ काममो क्षचतुविध पुरुपार्थसिद्धि द्वारा क्षीमहाकाली- महालद्ष्मी महासरम्वती देवताग्रीत्यथ॑ शापोद्धारपुरस्सरं फवचार्गलाकीलक- पाठ्येदतन्त्रोक्तरात्रिसृक्तपाददेज्यथवंशी प॑पाठन्यासविधिसह्दितनवा णेजपसप्त- इतीन्यासध्यानसहितचरित्रसस्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वक “मांफेण्डेय उदाच साथर्णिः सूर्यतनयों यो मनुः कथ्यत्ते5 ८मः इत्याद्यारभ्य 'सावर्णि- भविता मजुः इत्यन्तं दुर्गासप्तशत्तीपार्ठ तदन्ते न्‍्यासविधिसद्दितववा०-सन्त्र- जप॑ वेदतन्न्रोक्तरेचीसक्तपा् रहस्यन्नयपठनं शापोद्धारादिक क्रिष्ये

# पाठविधिः # श्ण ७+ह७७००ै०-०-+ैै०-५ इस प्रकार प्रतिज्ञा ( संकल्प ) करके देवीका ध्यान करते हुए. पश्चोपचारकी विधिसे पुस्तककी पूंजा करे योनिमुद्राका प्रदर्शन फरके भगवतीको प्रणाम करे; फिर मूल नवार्ण मन्‍्त्रसे पीठ आदिम आधारक्क्तिकी स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तककों विराजमान करे |# इसके बाद शापो- द्वार | करना चाहिये। इसके अनेक प्रकार हैं। “5० हीं क्लीं श्री क्रां क्री चण्डिकादेब्ये शापनाशालुग्रह कुरु कुरु स्वाह्यः इस मन्त्रका आदि और

१. पुस्तक-पूजाका मन्ते--- 3 नमो देव्ये महादेन्ये शिवाये सतत नमः किरेन 4 नमः प्रकृत्य॑ भद्राये नियता: प्रणवा: ताम्‌ ( वाराहीउन्त्र तथा चिदम्वरतद्विता )

# ध्यात्वा देवीं पत्नपूर्जा कृत्वा योन्‍या प्रणम्य च। आधार स्थाप्य मूलेन स्थापयेत्तत्र पुस्तकम्‌ |

+ सप्तशतती-सवंखके उपासनाक्रममें पहले शापोद्धार करके बादमें पडन्- सद्टित पाठ करनेका निर्णय किया गया दे। भतः कवच आदि पाठके पहले दी शापो- द्वार कर केना चाहिये फात्यायनी-तन्त्रम शापोद्धार तथा उत्कीलनका भौर शी प्रकार वतलाया गया दै---“अन्त्याधाकंद्विरुद्रत्रिदिगन्ध्यक्लेष्विमतंव: अश्वोडश्व॒ इति सर्गाणा शापोद्धारे मनोः क्रम: ॥? 'उत्कीलने चरित्राणां मध्याधन्तमियि क्रम: ।' भर्याव्‌ सप्तशती के अध्यायोंका तेरहइ-एक . वारह -दो, स्यारद---ती न) दस-चार, नौ--- पाँच तथा आठ---छः:के क्रमसे पाठ करके झन्तमें सातवें अध्यायको दो बार पढ़े यह शापोद्धार है और पहले मध्यम 'चरित्रका, फिर प्रथम चरित्रका। तत्पश्चाव उत्तर चरित्रका पाठ फरना उत्छीलन है | कुछ लोगोंके मतर्मे कीलकर्मे बताये अनुसार “ददाति प्रतिगृक्षाति'फे नियमसे कृष्णपक्षकी झष्टमी या चतुदंशी तिथियें देवीको सर्वंख-समपंण करके उन्‍्हींका दोकर उनके असादरूपसे अत्येक बस्तुकों उपयोगर्म छाना ही शापोद्धार और उत्कीलन है कोई कहते द्व---.छ: अम्मोंसद्दित पाठ करना दी शापीडार ऐै। णम्मेंका त्याग दी शाप दे कुछ विद्वानोंकी रायमें

१६ # श्रीदुगोसप्तशत्याम्‌ #

१९६०-००१०-.५०५५-५५३५-०५५०-०५४५ ..६..... ९. ३५ ..१, ३. ५... ३, . .+,....४.....५. ३... ..५. ...३. ...8. 8... अन्तर्म सात बार जप फरे यह शापोढ्धार मन्त्र कहलाता है| इसके अनन्तर उत्तोलन मन्त्रफा जप किया जाता है | इसका जप आदि और अन्‍्तर्म इकीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है--८3“ श्रीं कली हीं सप्त- शति चण्डिके उत्कीलन कुरु कुरु स्वाह् [? इसके जपके पश्चात्‌ और आदि- अन्तर्मे सात-सात वार मृतसंजीवनी विद्याका जप॑ करना चआहिये, जो इस प्रकार है---८3“ हीं हीं व॑ व॑ ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय

फ्रों हीं हीं व॑ स्वाहा |” मारीचकल्यके अनुसार ससझती शापविमोचनका

मन्त्र यह है---.५७£ श्रीं श्री कलीं हूं. ७४ क्षोमय मोहय उत्कील्य उत्कील्य उत्कील्य टं ठं |? इस मन्त्रका आरम्मर्मे ही एक सो आठ बार जप करना चाहिये, पाठके अन्तमें नहीं | अथवा रुद्रयामल महातन्त्रके अन्तर्गत दुर्गी- कल्पमें कप्टे हुए चण्डिका-शाप-विमोचन मनन्‍्त्रोका आरम्ममें ही पाठ करना चाहिये | वे मन्त्र इस प्रकार हैं--

४७ अस्य श्रीचण्डिकाया शद्मवप्तिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्थ वसिष्टनारद्संवाद्सामवेदाधिपतिब्रद्माण ऋपयः सर्वेश्वकारिणी श्रीहुगों देवता चरित्रत्रयं बीज द्वीं शक्तिः ब्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तो मम संकल्पितकार्यसिद्ध/यर्थें जपे घिनियोगः

(ट्वीं)रीं रेतःस्वरूपिण्ये मछुकरटभर्मर्दिन्ये ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्र-

शापोद्धार कर्म अनिवाय नहीं है; क्योंकि रदस्याध्यायमें यह स्पष्टरूपतते कष्ा है कि जिसे एक ही दिनमें पूरे पाठका अवसर मिले; वह एक दिन केवल मध्यम चरित्र भौर दूसरे दिन शेष दो चरित्रोंका पाठ करे इसके सिवा) जो प्रतिदिन नियमपूर्वक पाठ करते ऐैँ, उनके छिये एक दिनमें एक पाठ दो सकनेपर एक, दो) एक; चार; दो; एक भौर दो अध्यायेंके क्रमसे सात दिनेर्मे पाठ पूरा करनेका आदेश दिया गया दे ऐसी दशार्मे प्रतिदिन शापोद्धार और कीलक केसे

सम्भव दै भरतु, जो शो, एमने यहाँ जिशासुमेंके छामार्थ शापोद्धार भौर .

उत्दीक्नन दोनोंफे विधान दे दिये है

# पाठविधिः # १७

छापादू विम्ुक्ता भव ४४ श्रीं चुछ्तिस्वरूपिण्य महिपषासुरसेन्यनाश्िन्ये वद्यावसिष्टविश्वामिन्रद्यापाद्‌ विम्क्ता भव ४» र॑ रक्तस्वरूपिण्ये महिषासुरमर्दिन्ये प्रह्मवसिष्टविश्वामित्रशापाद्‌ विम्क्ता भव #* छुं क्षुधास्वरूपिण्ये देववन्दिताये बद्धवसिष्विश्वामित्रशापाद्‌ विमुक्ता भव ॥8॥ & झा ठायासरुपिण्ये दूतसंवादिन्ये ब्र्मवसिष्टविश्वामित्रशापाद्‌ विमुक्त भव ५॥ # हां शक्तिस्वरूपिण्ये घूत्रलोचनघातिन्ये ब्रह्मवसिष्टविश्वामित्र- शापाद्‌ विमुक्ता भव ४» तूं तृपास्वरूपिण्पे चण्डमुण्ठवधकारिण्पे प्रद्यावसिष्टविश्वामित्रशापाद्‌ विभ्लुक्ता भव ४० क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्य रक्तवीजवधकारिण्य म्रद्मवसिष्विश्वामित्रशापाद्‌ विम्ुक्ता भव ४० जा जातिस्वरूपिण्प निशुम्भवधकारिण्ये ब्द्मवसिष्ठविश्वामित्रशापादू विमुक्ता भव ह॥ कं छज्तास्वरूपिण्ये शुम्भवधकारिण्ये ब्रह्मवसिष्ठविश्वामिश्रशापाव्‌ विमुक्ता भव ॥१०॥ ४* धां शान्तिस्वरूपिण्ये देवस्तुस्ये ब्रद्ावसिएविश्वामिश्र- शापाद्‌ विम्ुुक्ता भव ११ श्र श्रद्धास्वरूपिण्ये सककफलदाण्पे ब्रद्धा- वसिष्ठविश्वामिश्नद्ञापाद्‌ विमुक्ता भव १२ <* का कान्तिस्वरूपिण्ये राजवरप्रदाये ग्रद्मवसिष्विश्वामिन्नशापाद्‌ विमुक्ता भव ३६ छे* सी माठृस्वरूपिण्प॑ भ्नर्गठमहिंससहिताये ब्रह्मवसि्ठविश्वामित्रशापाद्‌ विमुक्ता भव १४ ४* हीं श्रीं हुं दुगोंगे सं स्वैश्चय॑कारिण्ये मद्मवसिष्ठविश्वामित्र- ध्ापादू विम्लुक्ता भव १५ ४» ऐँ द्वी क्ली नमः शिवाय अमेद्यफवच- खरूपिण्ये प्रद्मवसिष्टविश्वामित्रशापाद्‌ विम्युक्ता भव १६ ए० क्रीं कादय कालि दीं फट स्वाहाये अऋणः्वेद्स्वरूपिण्ये अक्यवसिष्ठविश्वामित्रशापाद्‌ विमुक्ता भव १७० ४० ऐँ हीं क्लवी महाफालीमद्दालक्ष्मीमद्वासरम्वती- घ्वरूपिण्ये प्रिगुणात्मिकाये दुर्गादेब्ये नमः १८

हस्येवेल हि. महासन्त्रानु पढित्वा परमेश्वर उफ्टीपाद॑ दिवा रात्रो. कुर्यादेव संदायः १९ ४8 एवं मन्त्र जानाति चघचण्ढीपाद करोति यः। आत्मानं सेव दातारं क्षीण कुर्यात्ष संशयः २०

पु० छू० २--

१८. *# श्रीदुगौसप्तशत्याम्‌ *

इस प्रकार शापोद्धार करनेके अनन्तर अन्तमौतृका-बह्िमातृका आदि न्यात् करे, फिर श्रीदेवीका ध्यान करके रहस्यमें बताये अनुसार नी को्डोवाजे मन्त्र्मे महालक्ष्मी आदिका पूजन करे) इसके बाद छः अज्जलॉसद्वित दुर्गाससशती-..' का पाठ आरम्भ किया जाता है | कवच) अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य--- ये ही सप्तततीके छः अज्भ माने गये हैं इनके क्रममें भी मतमेद है चिदम्बरसंडितामम पहले अर्गंला, फिर कीलक तथा अन्तर्मे कवच पढनेका विधान है।# किंतु योगरत्नावलीमें पाठका क्रम इससे भिन्न हैं। उसमें कवचको बीज) अर्गलाको शक्ति तथा कील्कको फीलक संज्ञा दी गयी है| जिस प्रकार सब मन्त्रोंमे पहले बीजका, फिर शक्तिका तथा अन्तर्मे कीलकका उच्चारण होता. -< है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कबचरूप बीजका) फिर अरगरलारूपा शक्तिका तथा अन्तर कीलकरूप कीलकका क्रमहा: पाठ होना चाहिये |+ यहाँ इसी क्रमका अनुसरण किया गया है |

४++-+5'ररि.2/५-

» भगले कील्क॑ चादोी पठित्वा कवच पढेद। जप्या घपतप्तशती पश्चात्‌ सिद्धिकामेन मन्द्रिणा कबचें बीजमादिष्टमगेला शक्तिरुच्यते कीकक॑ कीलक प्राहु: सप्तशत्या महामनो: पा सर्वमन्त्रेपु बीजशक्तिकीलकानां प्रथममुच्चारणं सथा सप्तशर्सापाठेडपि झवचाग्गंलाकीलकानां प्रथम पाठः स्यात्‌ इस प्रकार छनेक तन्त्रोंके अनुप्तार सप्तशतीके पाठका क्रम भनेक प्रकारफा ५... उपरन्ध होता है ऐसी दशार्मे अपने देझमें पाठका जो क्रम पूर्वपरम्परासे प्रचलित

हो उसीका भनुसरण करना अच्छा है |

अथ देंव्या: कवचम

७» अ्स्य श्रीचण्टीफवचस्य त्रहद्मा ऋषि: अनुष्डप्‌ छन्‍्दः, चासुण्डा देवता, भड्नन्यासोक्तमातरो चीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तखम्‌, श्रीजगदम्बाग्रीत्यर्थे प्प्तम्नतीपाठाड्रत्वेन जपे विनियोगः

छा जे ३» नमश्रण्डिकाय ।।

हैः माकंण्डेय उवाच

यहुद्म॑ परम॑ लोके सर्वरक्षाकरं नृणास्‌ यन्न कस्यचिदाख्यातं॑ तन्‍्से ब्र्हि पितामह | ॥| बरह्योवाच

+ 0 हक अस्ति गुह्यतम॑ विप्र सवभूतोपकारकस्‌ | देव्यास्तु कवच पृण्यं तच्छूणुष्न महाप्ठने ।।

मिल 0, किक मल 2 की कल इक हब असर रस

४» चअण्डिका देवीको नमस्कार है

मारकण्डेयजीने कद्दा--पितामह ! जो इस संसारमे परमगोपनीय तथा मनुर्ष्योकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और जो अवतक अपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो) ऐसा कोई साधन मुझे बताइये ?

ब्रह्माजी बोले--तह्यन ! ऐसा साधन तो एक देवीका कवच ही हूं, जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय) पवित्र तथा सम्पुण प्राणियोंका उपकार

२० # श्रीदुगासप्तशत्याम्‌ *#

२७-५० िक-+ >विकन + किक-९ + पक. ०००+००७५ २००५ *ै०-५ <६....७०३७.. ०६७.. २२७५ ०४०-०-००३-५ ००७ #+2िक-+ “+%-० ०२०७३ -नस्किक्क “विक4

प्रथम शैलपुत्री हिंतीय त्ह्मचारिणी व॒तीय॑ चन्द्रघण्टेति कृष्माण्डेति चतुर्थकम्‌ रे है / पञ्चम स्कन्दमातेति पष्ठ॑ क्रात्यायतीति थे पे सप्तम॑ कालरात्रीति महागोरीति चाथ्टमम्‌

पल जल कक करनेवाला है| महाम॒ने | उसे श्रवण करो देवीकी नी मूर्तियों जिन्हें धनवदुर्गा? कहते हि उनके प्रथक-प्रथक नाम बतलाये जत्ते है | प्रथम ण्ज्च। कर मूर्ति कट 3, हक नाम शैलेपुन्री हें | दूसरी मूर्तिका नाम बहाचारिणी है। तीसरा स्वरूप पा: 2 पति 5 | चन्द्रधेण्टके नामसे प्रसिद्ध हे चोयी मूर्तिकों कृष्माडा + के पांचवी दुर्गाका नाम स्कन्दमौता है देवीके छठे रूपको कारयाईनी फके सातवाँ कार्लरानि और आठवाँ स्वरूप मद्दागौरी के नामसे प्रसिद्ध है। 0040 26468 / 4402 / 45 405 7 किक? कक

१. गिरिराज हिमालयकी पुत्री पार्वतीदेवी” यद्यपि ये सबकी भधीशरी हैं. 4यापि हिमालयकी तपस्या और प्रार्थनासे प्रसन्न क्रपापूर्वक उनको प्रश्नीके रूपमे प्रकट हुई यह वास पुराणोर्मि प्रसिद्ध है २. मंद चारयित शाह यस्था: सता मद्वाचारिणी---सच्चिदानन्द् मय म्द्ाखरूपकी प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव दो) दे भद्गाचारिणी! हैं ३. चन्द्र: घण्टायां यस्या: सा-आएछादकारी चद्धमा जिसके घण्टामे म्थिस हों, उस देवीका नाम “चन्द्रघण्टा? है। ४. कुत्सिसः उष्मा कृष्मा -त्रिविधताप- बुत: संसार: अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्माण्डा करयांत्‌ प्रिविष वापयुक्त संसार जिनके उदरमें स्थित है) वे भगवती “कृष्माण्डा कइलाती हैं «. छान्दोग्य श्रुतिके अनुसार भगवतीकी शक्तिसे उत्पन्न धुए सनत्कुमारका नाम स्कन्ड उनकी माता होनेसे वे स्कन्दमाता' कइलती एँ ६. देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके डिये देवी महर्षि काश्यायनके आश्रमपर भ्रकट हुईं और महर्षिने उन्हें भपनी कन्या माना, इसलिये “्कात्यायनो' नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई ७. सबको मारनेवाले कालकी भी रात्रि ( विनाशिका ) दोनेसे उनका नाम (कालरात्रि' है ८. हहोंने

# देवया: कवचम्‌ # २१:

नव सिद्धिदात्री नवदुर्गांः प्रकीर्तिताः उक्तान्येतानि नामानि बह्मणैव महात्मना | अग्तिना दक्ममानस्तु शब्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयाताः शरणं गताः॥ ६॥ तेपां जायते किंचिदशुमं॑ रणसंकटे | नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं हि।॥७॥ प्रैस्त भकत्या स्थृता नूल॑ तेपां इंड्धिः प्रजायते ये त्यां सरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः < ॥। प्रेतसंशा तु चाझुण्डा वाराही महिपासना। ऐल्द्री गजसमारूढा वेष्णवी गरुडासना॥ ९॥

2 कलम कलर पिन नर पित्त नर्वी दुर्गाका नास सिद्धिदान्ी है | ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवानके द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं ॥३---५॥ जो मनुष्य अग्निर्मे जल रहा हो; रण- भूमि शन्रुअसे घिर गया हो? विषम संकटमें फंस गया हो तथा इस प्रकार भयसे आदर दोकर जो भगवती दुर्गाकी शरणमें प्रात हुए. हों उनका कभी कोई अमज्जल नहीं होता युद्धके समय संकटमें पड़नेपर भी उनके ऊपर फोई विपत्ति नहीं दिगायी देती उन्हें शोक-हुःख और मभयकी प्राप्ति नहीं होती !॥ ६-७

भक्तिपूर्वक देवीफा स्मरण किया हैं? उनका निश्चय ही अम्युदय होता है देवेश्वरि ! जो तुम्हारा चिन्तन फरते हैं, उनफी तुम निःसंदेह रक्षा करती हो चाम॒ण्डादेवी प्रेतर आहूढ़ द्वोती हैं रत पछेपर सवारी करती हैं ऐन्द्रीका वाइन ऐरावत हाय है वैष्णवी

777 बपर्यादारा महान, गौखवणण प्राप्त किया या; अतः “महागौरी? कहृछायी », सिद्धि यो मोक्षको देनेवाटी छोनेसे उनका साम 'सिद्धिदात्री” द्दै।

>०..-.+०-) ९-५ »«-विक-ब.५क-)+-+

२२ # श्रीदुर्गासप्तशत्याम्‌ %

माहेश्वरी व्रपारूढा कोमारी शिखिवाहना लक्ष्मी: पद्मासना देवी पत्म॒हस्ता हरिग्रिया ॥१०॥ व्वेतरूपधरा. देघी इश्वरी वृपवाहना ब्राह्ष. इंससमारूढठ.... स्वाभरणभूषिता ॥११॥ सर्वेयोगसमन्विता कप इत्येता मातरः सवा: स्वोयोगसमन्विताः नानाभरणशोभाद्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२॥ इव्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः शह्ूं चक्र गदां शक्ति हे मुसलासुधम्‌ ॥१३॥ खेदक॑ तोमर चेंच परशुं पाशमेव च। कुन्तायुध॑ त्रिशुल॑ च. शाहनमायुधमुत्तमस्‌ ॥१४॥ देत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च॑ | धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां हिताय वें ॥१५॥ देवी गरुड़पर ही आसन जमाती हैं माहेश्वरी श्रपपर आउरूढ़ होती हैं। कौमारीका वाहन मयूर है भगवान्‌ विष्णुकी प्रियतमा रूक्ष्मीदेवी कमलके आसनपर विराजमान हैँ और हाथो कमल धारण फिये हुए हैं १० वरेपभपर आरूढ ईश्वरी देवीने इवेत रूप धारण कर रक्‍खा हैं ब्राह्ी देवी इंसपर बेठी हुई हैं और सब प्रकारके आभूषणोसे विभूषित है ११ इस प्रकार ये समी माताएँ सब प्रकारकी योगशक्तियोंसे सम्पन्न हैं | इनके सिवा ओर भी बहुत-सी देबियाँ हैं, जो अनेक प्रकारके आभूषणोंकी शोभासे युक्त तथा नाना प्रक्तारके सनोंसे सुशोभित हैँ १२॥ ये सम्पूर्ण देवियों क्रोधर्मे भरी हुई हैं और भक्तोंकी रक्षाके लिये रथपर बैठी दिखायी देती है शह्ल) चक्र, गदा) शक्ति; इल और मुसलछ) खेटक ओर तोमर) परशु तथा पादा, कुन्त और नरिशूल एवं उत्तम शा््घनुष आदि अख््र-शस्त्र अपने हाथो धारण

र् टेत्योफे करती हैं | देत्योंके शरीरका नाश करना; भक्तोंको अभयदान देना और देव ताओंका कल्याण करना---यही उनके छमस्त्र-धारणका उद्देश्य है ]|१६- १०॥

मन

रा

# देवया: कवचम्‌ *% २३ नमस्तेडस्तु महारोद्रे. महाघोरपराक्रमे महावले महोत्साहे महासयविनाशिनि ॥१६॥ त्राहि मां देवि दुष्प्रेन्‍्ये शत्रणां भयवर्द्धिनि | प्राच्यां रक्षतु मामेन्द्री आग्नेस्यामग्निदेवता ॥१७॥ दक्षिणेब्वतु वाराही नेऋत्यां खद़धारिणी प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्र बायव्यां मृगवाहिनी ॥१८॥ उदीच्यां पातु कोमारी ऐशान्यां शूलधारिणी | ऊच्चे ब्रह्माणि में रक्षेद्धस्ताद बेष्णवी तथा ॥१९॥ एवं दश दिशो शक्षेत्राप्ुण्डा शववाहना | जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु प्रष्ठतः ॥२०॥। अजिता वामपार्ख तु दक्षिण चापराजिता | शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ष्नि व्यवखिता ॥२१॥

[ कवच आरम्म करनेके पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-- ] महान

शैद्ररूप। अत्यन्त घोर पराक्रम, मदह्ान्‌ तरल और महान उत्साइवाली देवी |

तुम महान्‌ भयका नाश करनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है।॥|१६॥ तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है | शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके | मेरी रक्षा फरो।

पूर्वदिक्षामं ऐल्द्री ( इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे | अग्निकोणर्मे अग्निशक्ति) दक्षिण दिशामे वाराही तथा नेऋष्यक्रोणमें खड़गधारिणी मेरी रक्षा करे | पश्चिम दिद्यार्मे वारणी और वायव्यकोणमें मृगपर सवारी करनेवाली देवी मेरी रक्षा करे १७-१८ उत्तरदिशार्मे कौमारी और ईशानकोणमें भ्रूलघारिणीदेवी रक्षा करे | ब्रह्मणि | तुम ऊपरकी ओरसे मेरी रक्षा करो और वेष्णवी देवी नीचेफी ओरसे मेरी रक्षा करे ॥१९॥ इसी प्रकार शवकों अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डा देवी दर्सो दिशाओर्मे मेरी रक्षा करें |

जया आगेसे और विजया पीछेकी ओरसे मेरी रक्षा करे ||२०॥| वाम मागमें अजिता और दक्षिण मार्ग्म अपराजिता रक्षा करे | उद्योतिनी शिखा- की रक्षा फरे | उमा मेरे मस्तकपर विराजमान द्वोकर रक्षा करे २१

अक्ाकिक-->-> मत .

२४ *# श्रीदुगोसप्त शत्याम्‌ *

जज «निकल

रलनिकनलन-क- किक, $नॉरीगफ०---अरीय॥ >८-अर्ियात- “वा

मालाधरी ललाटे भ्रवों रक्षेद यशखिनी त्रिसेत्रा भ्रवोमध्ये यमघण्या थे नासिक्के ॥२२॥ शह्िनी चक्षुपोमध्ये . श्रोत्रयोद्दोर्वासिनी कपोलो कालिका रक्षेत्क्णंमूले तु शाहूरी ॥२३॥ नासिकायां सुगन्धा उत्तरोष्ठे चचिका | अधरे चाम्रृतकला जिह्यायां सरख्ती ॥२४॥ दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका | घण्टिकां चित्रधण्ठा महामाया तालुके ॥२०॥ कामाक्षी चिथुक॑ रक्षेद्‌ वां में सर्वभूला प्रीवायां भद्रकाली च॑ पृष्ठवंशे धलुधरी ॥२६॥ नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकाँ नलकूबरी स्कन्धयोः खड्जिनी रक्षेद्र वाह मे वजत्नधारिणी ॥२७॥ ललाटमें मालाघरी रक्षा करे और यशख्नी देवी मेरी मंर्दिका संरक्षण करे। भौहोंके मध्यभागमें त्रिनेत्रा और नथुनोंकी यमघण्टा देवी रक्षा करे ॥१२)॥ दो नेत्रोके मध्यभागमें शक्तिनी और फार्नेर्मि द्वारवासिनी रक्षा करे | कालिका देवी कपोर्लोकी तथा भगवती शाझ्भुरी कार्नोके मुलभागकी रक्षा करे ॥२३॥ नासिकार्मे सुगन्धा और ऊपरके ओठमें चचिका देवी रक्षा फरे | नीचेके ओठमें अम्ृतकला तथा जिह्ाामें सरस्वती रक्षा करे ॥२४॥ फोमारी दर्तोफी ओर चण्डिका कण्ठप्रदेशकी रक्षा फरे चित्रधण्टा गलेफी वॉटीकी और महामाया तादूमें रहकर रक्षा करे २५ कामाक्षी ठोढ़ीकी ओर सर्वमज्जला मेरी वाणीफी रक्षा करे | मद्रकाली प्रीवार्मे और घनुर्धरी पृष्ठ॑वंश ( मेरुदण्ड ) में रहकर रक्षा करे | २६ फण्ठके बाहरी भागमें नील्मीवा और फण्ठकी नलीमें नलकूबरी रक्षा फरे दोनों फन्धोमि खड्लिनी ओर मेरी दोनों म्ुजाओंफी वज्नधारिणी रक्षा करे २७

# देव्या: कपचम्‌ # २०

हस्तयोदण्डिनी रक्षेद्म्बिका चाह्ुलीपु च। नखाञ्छूलेश्वरी. र्षेत्छुश्शी रक्षेत्कुलेश्वरी २८॥ स्तनों रक्षेन्महादेवी मनः श्ोक्विनाशिनी : हंदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी २० नाभौ च॒ कामिनी रक्षेद्‌ गुद्यं गुल्मेज्वरी तथा पूतना कामिका मेढ शुदे महिपवाहिली ३२० कव्यां भगवती रक्षेज्ञानुनी विन्ध्यवासिनी जे महाबला श्षेत्सवेकामप्रदायिनी ३१ गुल्फयोनारसिंही पादपृष्ठे तु तेजसी। पादाहुलीपु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।। ३२ नखानू दंड्राकराली केशांश्वेबोध्यकेशिनी | रोमकूपेपु कोवेरी ल्वच॑ वागीखरी तथा ३३॥ दोनों दवर्थोर्मे दण्डिनी और अँगुलियोर्मि अम्बिका रक्षा करे | शलेश्वरी नर्खोकी रक्षा फरे | कुलेश्वरी कुक्षि ( पेट ) में रहकर रक्षा करे २८ महादेवी दोनों स्तर्नोंकी और शोकविनाशिनी देवी मनकी रक्षा करें ललिता देवी हृदयर्म ओर झूलघारिणी उदरमें रहकर रक्षा फरे २९॥ नाभि फामिनी और गुह्ममागकी गुप्लेश्वरी रक्षा करे | पूतना और कामिका लिड्ककी और महिषवाहिनी गुदाकी रक्षा करे ३० भगवती कठिभागर्मे और विन्ध्यवासिनी घुटनोंकी रक्षा करे। सम्ूर्ण कामनाओंको देनेवाली महावला देवी दोनों पिंडलियोंकी रक्षा करे ३१ ।। नारसिंददी दोनों घुध्योंकी और तैजसी देवी दोनों चरणोौके पष्ठमागकी रक्षा;करे श्रीदेवी पेरोंकी अन्लुल्योंम और तलवासिनी पेरोंके तलुओर्मे रहकर रक्षा करे || ३१२॥ अपनी दार्ढोंके फारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्राकराली देवी न्लॉकी और ऊध्वकेशिनी देवी केशॉकी रक्षा करे ) रोमावलियोंके छिद्गोर्मि कोवेरी ओर त्वचाकी

२६ # श्रीदुर्गोसप्तशत्याम्‌ *

+०औ७-.+-०१०..००६.....

०५३७.५५»०७..५ ००ह७-००+६ै०..५ ००-७..३--५.६७५.५ ५०.५ »+-िक-+ ००3-५०-०-क-५ >+-रिकन

रक्तमज़ावसामांसान्यस्थिमेदांसि * 0 क्तमज़ावसामांसान्यस्थिमेदां सि पाबती | अन्त्राणि कालरात्रिश्व पित्त मुकुटठेब्चरी २४ पत्नावती पद्मकोश कफे चूडामणिस्तथा

0 ८४5 ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या स्ेर्सान्धिपु || ३५॥ शुक्र ब्रह्माणि में रक्षेच्छायां छत्रेत्नरी तथा | हद 0 थारिणी

अहंकारं मना बुद्धि रक्षेन्मे धर्म: | ३६

प्राणापानों तथा न्यानमुदानं समानकम्‌

व्नहस्ता में रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना || ३७ |॥

रसे रूपे गन्धे शब्दे स्पर्श योगिनी

सत्य॑ ग्जस्तमक्चेच रक्षेच्रारायणी सदा ३८ |

आयू रक्षतु वाराही धरम रक्षतु वेष्णवी | यागीश्वरी देवी रक्षा करे ॥३३॥ पार्चती देवी रक्त, मजा, बसा; मांस, हड्डी और मेदकी रक्षा करे ऑर्तोकी काल्रयात्रि ओर पित्तकी मुकुदेश्वरी रक्षा करे ३४ मूछाधार आदि कमलकोपोमे पद्मावती देवी ओर कफमें चूडा- मणि देवी स्थित होकर रक्षा करे नखके तेजकी ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका क्रिसी भी अस्त्रसे भदन नहीं हो सकता, बद्द अभेद्या देवी अरीरफी समस्त सन्धियोंम रहकर रपक्षा करे || ३५

ब्रह्मणि | आप मेरे बोयंकी रक्षा करें | छत्नेश्वरी छायाकी तथा श्र्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धिफी रक्षा करे || ३२६ हाथमें . बज धारण करनेवाली वज्नहस्ता देवीं मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और * समान वायुकी रक्षा करें | कल्याणसे शोभित्त होनेवाल्ी भगवती ऋल्याणशोमना मेरे प्राणकी रक्षा करें॥ ३७ रस) रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श--इन विषयोका अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण) रजोगुण और तमोगुणकी रक्षा सदा नारायणी देवी करे ३८ वाराह्दी आयुक्ती रक्षा करे वेष्णबी धर्मकी रक्षा करे तथा

जय ना

# देवया: कवचम्‌ # २७

>> चिकन

यश कीर्ति लक्ष्मी धन विद्यां चक्रिणी ॥३९॥ गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेस्पशल्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान॒ु रक्षेन्सहालक्ष्मीमौयों रक्षतु भेरवी ॥॥४०॥ पन्‍थानं सुपथा रक्षेन्माग क्षेमकरी तथा राजद्वारे महालक्ष्मीबिंजया स्वतः खिता ॥४१॥ रक्षाहीन॑ तु॒यत्स्थानं॑ वजजितं कत्रचेन तु तत्सव रक्ष मे देवि जयल्ती पापनाशिनी ॥॥४२॥ पदमेके न॒गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः कवचेनावृतो नित्य यत्र. यत्रेव गच्छति ॥४३॥ तत्र तत्रारथलाभश्ष॒ विजयः सार्वकामिकः | य॑ य॑ं चिन्तयते काम त॑ त॑ं प्राप्नोति निश्चितम्‌ | चक्रिणी ( चक्र घारण करनेवाली ) देवी यश, कीति, लक्ष्मी, घन तथा विद्याकी रक्षा करे ॥३९॥ इन्द्राणि | आप मेरे गोत्रकी रक्षा करें | चण्डिके ! तुम मेरे पशुओंफी रक्षा करो | महालूछ्ष्मी पुत्रोंकी रक्षा करे और मैरवी पत्नीकी रक्षा करे || ४० मेरे पथकी सुपथा तथा मार्गंकी क्षेमकरी रक्षा फरे | राजाके दरबारमें महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याम ग्हनेवाली विजया देवी सम्पूण भर्येसि मेरी रक्षा करे ॥| ४१

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देवि | जो स्थान कवचमें नहों कद्दा गया हैं; अतएव रक्षासे रहित है; वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होः क्योंकि तुम विजयश्ञाल्नी ओर पापनाशिनी हो ॥४२॥ यदि अपने शरीरका भला चाहे तो मनुष्य बिना फवचके कहीं एक पग भी जाय--कंवचका पाठ करके ही यात्रा करें कवचकमे द्वारा सब ओरसे सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है; वहाँ-बहाँ उस घन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाली विजयकी प्रासि होती हैं। बह जिस-जिस अभीष्ठ वस्तुका लिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही ग्राम

२८ % श्रीदुगोसप्तशत्याम्‌ %#

परमेश्वयमतु्ल प्राप्यते भूतले. पुमान्‌ ॥४४॥ निर्भभो जायते मर्त्यः संग्रामेष्यपराजितः त्रेलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनाइतः पुसान्‌ ॥४५॥ हदं तु देव्याः कवच देवानामपि दुलभस्‌ ये पठेत्मग्रतो नित्य॑ त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वित+ ॥॥४६॥ देवी कला भवेत्तस्य त्रेलोक्येष्वपराजितः जीवेद वर्षशतं साग्रमपमृत्युविव्जितः ॥४७॥ नव्यन्ति व्याधय; सर्वे छताविस्फोटकादय: | स्थावरं जड्गमं चेव कृत्रिम चाए॑ि यहिपम््‌ ॥४४॥

कर लेता हैं; वह पुरुष इस पृथ्वीपर ठुलनारद्दित महान्‌ ऐस्र्यका भागी होता है ॥४३-४४॥ कवचसे सुरक्षित मनुष्य निर्मय हो जाता है युद्धमें उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकोंमें पूजनीय होता दे ॥४५॥ देवीका यह फवच देवताओंके लिये भी दुलंभ है | छो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीर्नों सन्ध्याओकि समय श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता हैं; उसे देवीकला प्राप्त होती है तथा वह तीनों छोकोमें कहीं भी पराजित नहीं होता | इतना ही नहीं, वह अपैमृत्युसे रहित सोसे मी अधिक वर्षोतक जीवित रहता है ॥| ४६-४७ || मकरी; चेचक और फोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, माँग, अफीम) घवूरे आदिका स्थावर विष) साँप ओर बिच्छू आदिके फाटनेसे चढ़ा हुआ जज्ञम विष तथा अहिफेन और तेलके संयोग आदिसे बननेवाला कृत्रिम विष-ये सभी प्रफारके विष दूर हो जाते हैं; उनका कोई असर नहीं होता ४८

१. णकालमृत्यु भथवा अग्नि) जढ, विजलो एवं सर्प णादिसे शोनेवाली मृत्युकों अपसृत्यु कह्दते हैं

क# देवयाः फवचम्‌ # रे,

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचरा: खेचरास्यंव जलजाशोपदेशिका; ॥| ४९ सहजा कुलजा माला डाकिती शाकिनी दथा अन्तरिक्षचरा घोरा डाझिल्यश्व महावलाः ५० ग्रहभृतपिशाचाश्र यक्षगन्धरव॑राक्षसाः ब्रह्मराक्षतवेतालाः. कृष्माण्डा. भेरवादय। ।। ५१ नच्यन्ति दर्शनात्तस्स कबचे हृदि संखिते। मानोज्तिभवेद्‌ राज्ञस्तेजोबृद्धिकरं परम्‌ ५२ ग्शसा वढ्धेते सोडपि कीर्तिमण्डितभूतदे ! जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कबच॑ पुरा ५३॥

इस प्रस्वोपर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग दोरे हैँ तथा इम प्रकारके जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं, वे सव इस क्वचको छुंदयमें घागण कर लेनेपर मनुष्यकों देखते ही नष्ट हो जाते हैं ये ही नहीं प्रस्वीपर विचरनेवाले आमदेवता, आकाशचारी देवविशेष: जलके सम्बन्धसे प्रकट होनेवाले गण, उपदेशमात्रसे सिद्ध होनेवाडे निम्नकोटिके देवता, अपने जनन्‍्मके साथ प्रकट होनेवाले देवता, कुलदेवता, माला ( कण्ठमाल्य आदि डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्षम विचरनेचाली अत्यन्त बल्वती भयानक डाफिनियाँ, ग्रह) भूत) पिशाच) यक्ष, गन्धव) राक्षस; ब्क्नाराक्षस, वेताल, कृष्माण्ड और भेरव आदि अनिष्टफारक देवता भी द्वदयमें कवच धारण फिये रहनेपर उस मनुष्यकों देखते ही भाग जाते हैं | कबचघारी पुरुषको राजासे सम्मान-इद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्यके तेजकी ब्रद्धि करनेवाला और उत्तम हैं ४९-५२ कवलका पाठ करनेवाला पुरुष अपनी कीतिंसे विभूषित भूतलूपर अपने सुयशके साथ-साथ ब्ृद्धिक्रो प्राप्त होता है | जो पहले कवचका पाठ करके

३० # श्रीदुर्गासघशत्याम्‌ #

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यावद्धूमण्डल॑ धत्ते. सशेलवनकाननस तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्‍्ततिः पुत्रपोत्रिकी || ५४॥ देहान्ते परम॑ स्थान यत्सुरैरपि दु्लभस्‌ प्राप्नोति पुरुपो नित्य॑ महामायाप्रसादतः ।। ५५॥।

लभते परम रूप॑ शिवेन सह मोदते ॥| ५६ इति देव्याः कवच सम्पूर्णम्‌

अथागेलास्तोत्रम्‌ ४० श्रस्थ श्रीअर्गलास्तोन्रमन्त्रस्य विष्णुऋंषिः, भनुष्द्धप्‌ छन्दः, घीमहालक्ष्मीद बता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाडत्वेन जपे विनियोग: ३४ नमश्रृण्डिकाये ।। मार्कण्डेय उवाच

जयन्ती मद्भला काली भद्रकाढी कपालिनी

उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जबतक बन पर्वत

और कानर्नेंसहित यह पएथ्यी टिकी रहती है, तबतक यहाँ पुत्र-गौत्र आदि संतानपरम्परा बनी रहती है ५३-५४ || फिर देहका अन्त होनेपर बह पुरुष भगवती मद्दामायाके प्रसादसे उस नित्य परमपदको प्राप्त द्ोता हैं, जो देवताओंके लिये भी दुलम है ॥५५॥ वह सुन्दर दिव्य रूप घारण करता

और कल्याणमय शिवके साथ आनन्दका भागी द्वोता है ५६ सु >ैौ-.-#*-30085:९४---०+--- ३० चअण्डिकादेवीकों नमस्कार हैं

मार्कण्डेयजी कहते हैं--जय॑न्ती, . मड्ली। . कौली।

१. जयति सर्वोत्करपंण वर्तते इति “जयन्ती'---सवसे उत्कृष्ट एवं विजय- शालिनी २. मन जननमरणादिरूपं सर्पणं भक्तानां लाति गृद्धाति नाशयति या सा मझला प्रोक्षप्रदा---जों भपने भक्तोंके जन्म-मरण आदि संसार-वन्धनको दूर करती ऐ, उस मोक्ष- दायिनी मशुलूमयी देवीका नाम “्मग्ला' है। ३. कलयति भक्षयति प्रल्यकाले सबंम्‌ इति

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# अगंलास्तोत्रम्‌ #

>स्मि कक निचत->

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री खाहाय खथा नमोउस्तु ते ॥!

जय त्ं देवि चामुण्डे जय भूतातिहारिणि

जय सबंगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते॥२॥

मधुकेटभविद्राविविधातवरदे नमः

रूपं देहि जय॑ं देहि यशों देहि द्विपो जहि ३॥ भद्रकाली, फपालिनी, दुर्ग) क्षमी, शिवा, धीज्ी) स्तौहा और स्वैधा-- श्न नामोेंसे प्रसिद्ध जगदम्बिके ! तुम्हें मेरा नमस्कार हो देवि चामुण्डे | तुम्हारी जय हो सम्पूर्ण प्राणियोंकी पीड़ा हर्नेवाली देवि ! तुम्दारी जय हो | सबमें व्याप्त रहनेवाली देवि | तुम्हारी जय हो | कालरात्रि ! तुम्हें नमस्कार हो १-२ मधु ओर केट्मकों मारनेवाली तथा ब्रह्माजीको वरदान देनेवाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है | तुम मुझे रूप ( आत्मस्वरूपका शान ) दो, जय (मोहपर विजय) दो; यश (मोह-विजय तथा ज्ञान-प्रासिरूप यश) काली---जो प्रल्यकालमें सम्पूर्ण सष्टिकों अपना ग्रास बना लेती है, वह “काली? है

2. भद्र मइलं सुख वा कलुयति स्वीकरोति भक्तेम्यों दातुम्‌ शति मद्रकाली धुसप्रदा---जो अपने भक्तोंको देनेके लिये द्वी मद्र-सुख कि वा मझुल स्वीकार करतो है; वदद 'भद्गकाली? हे २. द्ार्थोर्मे कपाल तथा गलेमें मुण्डमाला धारण करनेवाली . दुःखेन भ्रष्टाकुयोगकर्मोपासनारूपेण क्लेशेन गम्यते प्राप्यते या सा दुगौ--जो अष्टाइयोग, कम एवं उपासनारूप दुःसाध्य सापनसे प्राप्त होती हैं, वे जगदम्विका “दुर्गा! कहलाती हैं ४. क्षमते सहते भक्तानाम्‌ अन्येपां वा सर्वानपराधान्‌ जननीत्वेनातिशयकरंणा- मयस्वभावादिति क्षमा---सम्पूर्ण जगव॒को जननो द्ोनेसे अत्यन्त करणामय स्वभाव ोनेके कारण जो भक्तों अथवा दूसरोंके मी सारे अपराध क्षमा करतो है, उनका नाम “क्षमा” है। ५. सबका शिव अर्थात्‌ कल्याण करनेवाली जगदम्वाको “शिवा” कहते हैं ६. सम्पूर्ण प्रपन्नको धारण करनेके कारण भगवतीका नाम “धात्री? है | ७.स्वाह्म- * रूपसे यक्षमाग अद्वण करके देवताओंका पोषण करनेवाली ८. स्वधारूपसे श्राद्ध भौर तपंणकों स्वीकार करके पितरोंका पोषण करनेवाली

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०... ७...

# श्रीदुगोसप्तशत्याम्‌ #

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महिपासुरनिणोशि भक्तानां सुखदे नसः। रूप देहि जय॑ देहि गशो देहि द्विपों जहि || रक्ततीजवधे. देवि. चण्उमुण्डविनाशिनि रूपं देहि जय॑ देहि यशों देहि द्विपो जहि ॥५॥ शुस्भस्येव निशुम्भस्य धृम्राक्षस्य मर्दिनि। रूप देहि जय॑ देहि यशो देहि द्विपों जहि॥ ६॥ बन्दिताइ॒धियुग देवि सर्वसोभाग्यदायिनि रूप॑ देहि जय॑ देहि यशो देंहि ह्विपो जहि ७॥ अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशन्रुविनाशिनि रूप देहि जय॑ देहि यशो देहि द्विपो जहि नतेस्यः सर्वदा भकत्या चण्डिके दुरितापहे |

दो और काम-कोघष आदि शबत्रुऑका नाश फरो हे महिषासुरका नाश करनेवाली तथा भक्तोंको सुख्ब देनेवाली देवि | तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो) यश्ञ दो और काम-क्रोष आदि झत्रुआंका नाश करो रक्‍्तवीजका वध और चण्ड-मुण्डका विनाश करनेवाली देवि | तुम रूप दो) लय दो; यश दो और फाम-क्रोष आदि शबरुओंका नाश फरो झम्म और निश्नम्म तथा धूम्रलोचनका मर्दन फरनेवाली देवि | तुम रूप दो) जय दो यश दो और काम-क्रोध आदि शन्रुरओका नाश करो सबके द्वारा बरन्दित युगल चरणोवाली तथा सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान फरनेवाली देवि | तुम रूप दो) जय दो) यज्ञ दो और काम-क्रोध आदि शलनुर्ओका नाझ करो ॥| देवि ! तुम्दारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं | तुम तमस्त शत्रुऑफा नाश करनेवाली हो | रूप दो) जय दो) यश्ञ दो और काम-क्रोघ आदि शन्रुओंका नाश फरो पार्षोको दूर करनेवाली चण्डिके | जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणोंमें सर्वदा मस्तक झकाते हैं।

# अर्ग्ास्तोत्रम्‌ # झ््३े

रूप देहि जय॑ देहि यशो देहि हिपो जहि॥ ९॥ स्तुवद्भ्यो भक्तिपूव त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि |

रूप देहि जय देंहि यशों देहि द्विपो जहि:॥१०॥ चण्डिके' सततं ये त्वामचेयन्तीह भक्तितः

रूप देहि जय॑ं देहि यशों देहि द्विपो जहि॥११॥ देहि. सौभाग्यमारोम्य॑ देहि मे परम सुखम |. . रूप देहि जय देहि यज्ञो देहि ह्विपो जहि .१२॥ विधेहि: छिदतां. लाश विधेहि वलएचकः रूप देहि जय॑ देहि यज्ञों देहि टिपो 'जहि।॥ १श॥ विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्‌ |

रूप. देहि. जय॑ -देहि यश्ञो देहि हद्विपो जहि.]॥१४७॥ सुरासुरश्रोसत्ननिषश्ृृष्टचरणेडम्बिकिे. * . ..ै।

उन्हें रूप दो, जय दो3 वश दो ओर उनके काम-क्रोव आदि शज्रुओंका नाञझ्ष

करो